रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
by महाकवि केशवदास
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गहना । उरज = स्तन । उजारि के = उजाड़नेवाले, कंटकबिद्ध । सारु =
तात्त्विक साधना ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति सखी से) पैरों में सर्प उलझ जाते हैं, उनके
फण कुचल जाते हैं। अनेक निशाचर चारो दिशाओं में उसे देख रहे हैं।
मूसलाधार पानी बरस रहा है, पर वह उसे कुछ नहीं गिनती । झींगुरों का
शोर भी वह नहीं सुनती । जलधारा की प्रचंड ध्वनि भी उसे सुनाई नहीं
पड़ती । गहनों के गिरने का भी उसे पता नहीं चलता । काँटों से फँसकर वस्त्र
का फटना और छाती पर के स्तनों का कष्ट पाना भी उसे ज्ञात नहीं होता ।
प्रेतों की स्त्रियाँ उसकी इस एकाग्रता को देखकर पूछती हैं कि ऐ अभिसारिके
तूने योग-साधना के तत्व से पूर्ण यह अभिसार किससे सीखा है ?
प्रकाश कामाभिसारिका, यथा—( सवैया )
(२६६) गोप बड़े बड़े बैठे अथाइन केसव कोटि सभा अवगाहीं ।
खेलत बालकजाल गलीन में बाल बिलोकि बिलोकि बिकाहीं ।
आवति जाति लुगाईं चहूँ दिसि घूंघट में पहिचाननि छाहीं ।
चंद सो आनन काढ़ि कहा चली'सूझत है कछु तोहि कि नाहीं।३२
शब्दार्थ—अथाई = बैठक, गोष्ठी । अवगाहीं = कर चुके हैं, थहा चुके
हैं अर्थात् सभा में प्रवीण हैं। जाल = समूह । बाल = नवयुवती । बिकाहीं =
मुग्ध हो जाती हैं । लुगाई = स्त्रियाँ । छाहीं = छाया ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति नायिका प्रति ) तू (इस समय) चंद्र-समान
मुख खोले कहाँ जा रही है ? तुझे कुछ दिखाई देता है या नहीं ? बड़े बड़े
( वयोवृद्ध ) गोप बैठकों में बैठे हैं। ऐसे गोप जिन्होंने करोड़ो ( अनेक )
सभाएँ की हैं। गलियों में बालकों का समूह खेल रहा है, जिन्हें देख देखकर
बालाएँ मोहित हो जाती हैं। चारो ओर स्त्रियाँ आ जा रही हैं। ऐसी स्त्रियाँ
जो घूँघट के भीतर की भी छाया पहचान लेती हैं। ( फिर भी तू निर्भय
चली जा रही हैं ! ) ।
(२७०) केसवदास सुतीन बिधि, बरनि स्वकीया नारि ।
परकीया द्वै भाँति पुनि, आठ आठ अनुहारि ।३३।
(२७१) उत्तम मध्यम अधम अरु, तीन तीन बिधि जान ।
प्रकट तीन सै साठ तिय, केसवदास बखान ।३४।
सूचना—स्वकीयादि ३ x पद्मिनी आदि ४ = (१२ + परकीया२ + सामान्य।
१ = १५) x स्वाधीनपतिकादि ८ = १२० x उत्तमादि ३ = सब ३६० !
३२—कोटि--कोरि । ३३—सु-रु ।