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रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

by महाकवि केशवदास

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DevanagariHindipublished286 pages

Page 149 of 286

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Page 149

१५२ रसिकप्रिया
सूचना—(१) प्रेम का रंग लाल होता है और रोष का भी रंग
लाल होता है।
(२) इस छंद के अनेक शंका-समाधान टीकाकारों ने किए हैं।
अथ प्रोषितपतिका-लक्षण—(दोहा)
(२५६) जाको प्रीतम दै अवधि, गयो कौनहूँ काज।
ताकौं प्रोषितप्रेयसी, कहि बरनत कबिराज ।१६।
प्रच्छन्न प्रोषितपतिका—यथा, (सवैया)
(२५७) केसव कैसेहूँ पूरब पुन्य मिल्यो मनभावतो भाग भरयो री ।
जानै को माई कहा भयो क्यौंहूँ जु औधि को अधिक द्योस टरचोरी।
ताकहूँ तूं न अजौं हँसि बोलै जऊ मेरो मोहन पाइ परयो री।
काठहु तै हठ तेरो कठोर इतैं बिरहानलहूँ न जरयो री ।२०।
शब्दार्थ—मनभावती = मनचहेता (नायक) । भाग भरयो = भाग्यवती
हुई। माई = हे माई, आश्चर्यबोधक। अधिक = आधा। द्योस = दिवस, दिन।
टरचो री = टल गया, बीत गया। अजौं = अब भी। इतैं = इतने तीव्र ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति नायिका से) हे सखी, न जाने क्या कारण
हुआ कि अवधि से केवल आधा दिन ही किसी प्रकार अधिक व्यतीत हो गया
और श्रीकृष्ण प्रतिज्ञानुसार समय पर नहीं पहुँच सके। इतने थोड़े समय के
विलंब के लिए तू अब भी उनसे हँसकर नहीं बोल रही है, यद्यपि वे तेरे पैरों
पड़ रहे हैं। यह नहीं समझती कि न जाने किस पूर्वजन्म के पुण्य से प्रिय से
भेंट हुई है, भाग्योदय का समय आया है। इसलिए मेरी दृष्टि में निश्चय ही
तेरा हठ काठ से भी कड़ा है। क्योंकि उनके वियोग की विरहाग्नि में भी
वह न जल सका ( तो अब क्या आशा की जाय, अब भी तो तू अपना हठ
नहीं छोड़ती )।
प्रकाश प्रोषितपतिका, यथा—(सवैया)
(२५८) औधि दै आए उहाँ उनसों यह भोजन कै अब ही हम ऐहैं।
ताकहँ तौ अब लौं बहराइके राखी बरघाइ मरु करि मैं हैं।
बैठे कहा इनके ढिग केसव जाउ नहीं कोउ आइ जु कैहैं।
जानत हौ उन आँखिनि तें अँसुवा उमहैं बहुरयो पुनि रहैं ।२१।
शब्दार्थ—उनसों = उस नायिका को। अब ही = अभी। ऐहैं = आएँगे।
अब लौं = अब तक। बहराइकै = भुलावा दे करके। बरघाइ = बलात् । मरु
१६—प्रोषितपतिका-प्रोषित प्रेयसी । २०— क्यौंहूँ जु-कैसेहूँ, कान्ह को ।
अधिक-आधो कु । टरचो-ढरचो । बोलै०-बोलति मेरो ज्यौं । हूँ न-
दूनो । २१—आए-आपु । उनसों-उनको । यह-यहाँ । बरघाइ-स्ववाह, बराइ ।
मरु०-बरु कहि । इनके-इनकी । जाप-जाउ । उन-इन । उमहै-उमड्यो ।