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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 10

( ४ ) प्रस्तावना ।
“ अल्पमात्रोपयोगित्वादरुचेरप्रसंगतः ।
क्षिप्रमारोग्यदायित्वाद्यौषधेभ्यो रसोऽधिकः ” ॥
रसकी मात्रा (खुराक) बहुत थोडी होती है,इसके सेवनमें अरुचि भी
नहीं होती और शीघ्र ही आरोग्यता प्राप्त होजाती है इसलिये सब
औषधियोंमें रस श्रेष्ठ माना जाता है। परंतु रसक्रियामें निपुणता
होनेपर ही यह शास्त्र लाभदायक हो सकता है। यदि विधिपूर्वक रस
धात्वादि शोधन मारण किये हुए हों तो एक तो वह जितने पुराने होते
जायँ उतने ही गुणकारी होते जाते हैं और योगवाही होनेसे एक रससे
ही संपूर्ण रोग दूर हो सकते हैं इसलिये यह शास्त्र परमहितकारी है।
ऐसी कथा सुननेमें आती है कि,जब महादेवके गणों द्वारा काटा हुआ
दक्षका शिर अश्विनीकुमारोंने जोड दिया तो आयुर्वेद शास्त्रकी विचि-
त्रता देख अश्विनीकुमारोंकी बडी प्रशंसा होने लगी। इसे देख भैरव
ब्रह्माके पास गये और उनसे आयुर्वेद शास्त्रके पढनेकी प्रार्थना की।
ब्रह्माने कहा तुम तामसी स्वभावके जन हो इसलिये आयुर्वेदके अधि-
कारी नहीं हो, तुमको आयुर्वेद नहीं सिखाया जायगा। यह सुन रोषमें
आ भैरवने त्रिशूलसे ब्रह्माका मस्तक काट दिया, तदनन्तर अश्विनी-
कुमारोंने वह भी जोड दिया यह देख भैरव दुःखित हो जंगलमें लक-
डियें एकत्रित कर जलकर मरनेको तैयार हुए। तब महादेवजीने इन्हें
सन्तोष देकर यह रसचिकित्सा सुनाई और कहा कि यह सबसे अधिक
आदर पायेगी तबसे यह चिकित्सा सर्वश्रेष्ठ उत्पन्न या प्रगट हुई।
जैसे धन्वंतरि, आत्रेय, सुश्रुत, चरक आदि वनौषधि चिकित्साके
विद्वान् हुए वैसे ही भैरव, नागार्जुन, सोमदेव, स्वच्छन्दभैरव, सिद्धनाथ
आदि रसचिकित्साके विद्वान् हुए हैं। इनके बनाये “रसचिकित्सा” के
अनेक ग्रंथ हैं।