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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

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DevanagariHindipublished362 pages

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प्रविष्ट ( धंसा ) करके आस पास की सन्धि को भैंस के दुग्ध से पीसे हुए माष चूर्ण, लौहकिट्ट आदि के कल्क से विलिप्त करके सुखाकर चूल्हे पर चढ़ा के अग्नि जलादें । इससे पारद का अधः पातन होता है ।

अथवा एक मिट्टी का भाण्ड लेकर औंधामुख करके पृथ्वी पर रखकर उसके पृष्ठ भाग पर आठ अङ्गुल चौड़ा, दश अङ्गुल लम्बा तथा चार अङ्गुल मोटा एक चिकनी मिट्टी अथवा उड़दी की पिष्टी का आलवाल ( थाला ) बनाकर सुखालें । फिर सोलह अङ्गुल चौड़े पृष्ठ वाला एक भाण्ड लेकर उसके भीतरी तल में पारद कल्क का लेप करके सुखाकर इसके मुख को पृष्ठ पर आल वाल वाले अधोमुखकृत भाण्ड के मुख से मिलाकर भैंस के दुग्ध, माषचूर्ण और मण्डूर किट्टादिकृत कल्क से सन्धिबन्धन करके सुखाकर चूल्हे पर चढ़ा के अग्नि जला दें । आलवाल के भीतरी गरम हुए जल को थोडी२ देर में निकालर कर उसमें शीतल जल बार२ डालते रहना चाहिए । इससे पारद का ऊर्ध्वपातन संस्कार होता है तथा यह अर्थ चित्रानुकूल भी है ।