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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

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DevanagariHindipublished362 pages

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दशमोऽध्यायः ।
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चाहिए। इस प्रकार से बनाई हुई मूषा के अन्दर सिद्ध किया हुआ पारद अत्यन्त देहसिद्ध्यादि गुणों को करने लायक हो जाता है। इसको योगमूषा कहते हैं॥१०-११॥

अथ वज्रद्रावणीमूषा—

गारभूनागधौताभ्यां शणैर्दग्धतुषैरपि ।
समैः समा च मूषा मृन्महिषोदुग्धमर्दिता ॥ १२ ॥
क्रौञ्चिका यन्त्रमात्रं हि बहुधा परिकीर्त्तिता ।
तया विरचिता मूषा वज्रद्रावणिकोचिता ॥ १३ ॥

तालाव का चिकना गारा (मिट्टी), केन्चुओं का सत्त्व या उनकी मिट्टी, सनई, जले हुए तुषों की राख, इन सबको समान भाग लेकर तथा इनके बराबर मूषा बनाने की मिट्टी लेकर सबको एकत्रित करके भैंस के दुग्ध से घोट कर जिस यन्त्र में मूषा रखनी हो उस यन्त्र के अनुसार छोटी, बड़ी अनेक प्रकार की मूषा बनानी चाहिए। इस प्रकार की मूषा को वज्रद्रावणिका मूषा कहते हैं। यह मूषा हीरा आदि कठोर पदार्थों के द्रावण करने में उत्तम होती है ॥ १२-१३ ॥

अथ गारमूषा—

दुग्धषड्गुणगाराष्टकिट्टाङ्गारशणान्विता ।
कृष्णमृद्भिः कृता मूषा गारमूषेत्युदाहृता ॥
यामयुग्मपरिध्मानान्नासौ द्रवति वह्निना ॥ १४ ॥

जली हुई गार के ६ भाग तथा मण्डूर, कोयले, “सनई ९ ये प्रत्येक ८ भाग लेकर मूषोपयोगी काली मिट्टी में मिला कर के भैंस के दुग्ध में सबको खूब घोट कर मूषा बनानी चाहिए। इसको गारमूषा कहते हैं। यह गारमूषा दो प्रहर तक अग्नि में फूंकने से भी नहीं द्रुत होती है ॥ १४ ॥

अथ वरमूषा—

वज्राङ्गारतुषास्तुल्यास्तच्चतुर्गुणमृत्तिका ।
गारा च मृत्तिकातुल्या सर्वैरेतैर्विनिर्मिता ॥
वरमूषेति निर्दिष्टा याममग्निं सहेत सा ॥ १५ ॥

थूहर की लकड़ी के कोयले (या उनकी राख) और तुषों की राख ये दोनों समान भाग लेकर तथा इन दोनों से चौगुनी कालीमिट्टी तथा मिट्टी के बराबर