रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in context२६६ रसरत्नसमुच्चये—
मतान्तरम्—
या मृत्तिका दुग्धतुषैः शणेन शिखित्रकैर्वा हयलद्दिना च ।
लौहेन दण्डेन च कुट्टिता या साधारणा स्यात्खलु मूषिकार्थे ॥७॥
जलेहुए तुषों की राख ( भूसी की राख ), सनई, कोयले तथा घोड़े की लीद इन सब वस्तुओं को मिट्टी के बराबर लेकर उसमें मिला देवें, फिर एक लोहे के दण्डे से सबको खूब कूटकर बारीक कर लेना चाहिए। इस तरह की बनी हुई मृत्तिका मूषा बनाने के लिये साधारण तया ठीक होती है ॥ ७ ॥
मूषामृत्तिकायां संयोज्यद्रव्याणि—
श्वेताश्मानस्तुषा दग्धाः शिखित्राः शणखर्परे ।
लद्धिः किट्टं कृष्णमृत्स्ना संयोज्या मूषिकामृदि ॥ ८ ॥
सफेद पत्थर, जले हुए तुष, कोयले, सनई ( शण ), खर्पर ( घटकपाल ) का चूर्ण, घोड़े की लीद, मण्डूर, कालीमिट्टी, इतनी वस्तुएं मूषा बनाने की मिट्टी, में मिलानी चाहिए ॥ ८ ॥
अथ वज्रमूषा—
मृदस्त्रिभागाः शणलद्दिभागौ भागश्च निर्दग्धतुषोपलादेः ।
किट्टार्धभागं परिखण्ड्य वज्रमूषांविदध्यात्खलु सत्त्वपाते ॥ ९ ॥
मिट्टी के ३ भाग, सनई और लीद के दो भाग, जले हुए भूसे का १ भाग, श्वेत पत्थर का १ भाग, मण्डूर का आधाभाग, इन सब को अच्छी तरह कूट कर धातु वगैरहके सत्त्व पातन करनेके लिये मूषा तैयार करें। इसको वज्रमूषा कहते हैं॥९॥
अथ योगमूषा—
दग्धाङ्गारतुषोपेताः मृत्स्ना वल्मीकमृत्तिका ।
तत्तद्बिडसमायुक्ता तत्तद्बिडविलेपिता ॥ १० ॥
तया या विहिता मूषा योगमूषेति कथ्यते ।
अनया साधितः सूतो जायते गुणवत्तरः ॥ ११ ॥
जले हुए तुष और कोयलों की राख, दीमक के घर की मिट्टी, पाण्डुरस्थूलादि गुणों वाली मिट्टी और बिड़ ( क्षार, अम्ल, गन्धक, लवण ). इन सब पदार्थों को एकत्रित कर ओखली में अच्छी प्रकार से कूट करके मूषा बना लेनी चाहिए। फिर इस मूषा को भीतर तथा बाहर से विड़ के घोल से लिप्त करके सुखा लेनी