रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in context- नवमोऽध्यायः । २५९
कर इन तीनों को बबूल के क्वाथ से खूब घोटकर लेह के समान बना लेते हैं। इसको जलमृत्तिका कहते हैं। इस मृत्तिका से सन्धिवन्धन करने से जलादिक से यह सन्धि की मिट्टी नहीं छूट सकती है ॥ ६० ॥
तत्र वह्निमृत्स्ना—
खटिकापटुकित्तैश्च महिषीदुग्धमर्दितैः ।
वह्निमृत्स्ना भवेद्घोरवह्नितापसहा खलु ॥ ६१ ॥
एतया मृत्स्नया रुद्धो न गन्तुं क्षमते रसः ।
विदग्धवनिताप्रौढप्रेम्णा रुद्धः पुमानिव ॥ ६२ ॥
खड़िया, निमक और मण्डूर के चूर्ण को भैंस के दुग्ध से अच्छी प्रकार घोटकर वह्निमृत्स्ना बनाई जाती है, यह वह्निमृत्तिका अत्यन्त तेज अग्नि के ताप को सहन कर सकती है। इस मृत्तिका से कपरोटी करके रोका हुआ पारद अत्यन्त तेज आंच लगने पर भी हावभाव कटाक्षादि करने में चतुर नायिका के प्रगाढ प्रेम से रुके हुए पुरुष की तरह कहीं उड़कर नहीं जा सकता है ॥ ६१-६२ ॥
शेषनाभियन्त्रवर्णनम्—
नन्दी नागार्जुनश्चैव ब्रह्मज्योतिर्मुनीश्वरः ।
वेत्ति श्रीसोमदेवश्च नापरः पृथिवीतले ॥ ६३ ॥
ततो जलं विनिक्षिप्य वह्निं प्रज्वालयेदधः ।
नाभियन्त्रमिदं प्रोक्तं नन्दिना सर्ववेदिना ॥
अनेन जीर्यते सूतो निर्धूमः शुद्धगन्धकः ॥ ६४ ॥
इस यंत्र की विधि को नन्दी, नागार्जुन, ब्रह्मज्योति, मुनीश्वर और सोमदेव ये ही पांचों रस-शास्त्र के आचार्य जानते हैं। इसको इस पृथ्वी में दूसरा कोई नहीं जानता है। फिर इस प्रकार उस यन्त्र को चूल्हे पर चढा कर के आलवाल तथा मूषा के चारों तरफ़ के बचे हुए सकोरे के अवकाश में जलभर के नीचे आग जला देनी चाहिए। सर्व प्रकार की रस की क्रियाओं के ज्ञाता नन्दी ने इसको नाभियंत्र कहा है। इस यंत्र के द्वारा शुद्धगन्धक के साथ पारद का निर्धूम जारण हो जाता है ॥ ६३-६४ ॥
अथ ग्रस्तयन्त्रम्—
मूषां मूषोदराविष्टामारद्यन्तःसमवर्तुलाम् ।