Skip to content
SarvaKosh
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

DevanagariHindipublished362 pages

Page 348 of 362

Read in context
Page 348

२५८ रसरत्नसमुच्चये—

-हण्डिका रख कर नीचे की हण्डिका के मुख को ऊपर रखी हुई हण्डिका के पृष्ठ भाग के साथ अच्छी तरह कपड़मिट्टी से बन्द कर के फिर ऊपर की हण्डिका में जल भर देते हैं और चूल्हे पर चढ़ाकर नीचे की हण्डिका को आंच पहुंचाते हैं। इसको विद्याधरयंत्र कहते हैं। इस यंत्र का उपयोग हिंगुल से पारद को निकालने के लिये करते हैं ॥ ५६ ॥

अथ डमरुयन्त्रम्—

यन्त्रस्थाल्युपरि स्थालीं न्युब्जां दत्त्वा निरुन्धयेत्।
यन्त्रं डमरुकाख्यं तद्रसभस्मकृते हितम् ॥ ५७ ॥

एक मिट्टी की हण्डिका लेकर इसके मुख को दूसरी हण्डिका के मुख के साथ सन्धिबन्धन कर देते हैं। इस यंत्र की आकृति डमरू के समान हो जाती है इस लिये इसको डमरूयंत्र कहते हैं। यह डमरूयंत्र पारद की भस्म करने के लिये उपयोगी होता है ॥ ५७ ॥

अथ नाभियन्त्रम्—

मल्लमध्ये चरेद्गर्तं तत्र सूतं सगन्धकम्।
गर्तस्य परितः कुड्यं प्रकुर्यादङ्गुलोच्छ्रितम् ॥ ५८ ॥
ततश्चाऽऽच्छादयेत्सम्यग्गोस्तनाकारमूषया।
सम्यक् तोयमृदा रुद्ध्वा सम्यगत्राच्यमानया ॥ ५९ ॥

एक सकोरे के भीतर गड्ढा बना कर उसमें गन्धक और पारद भर देवे। फिर उस गड्ढे के चारों ओर एक अङ्गुल ऊंची पाली (अलवाल या मेड़ के समान) बना कर उस पाली को गाय के स्तन की आकृति वाली मूषा से (औंधाकर) ढक करके अच्छी प्रकार बनाई हुई तोयमृत्तिका से अच्छी तरह पाली तथा मूषा की सन्धि या अवकाश को बन्दकर देना चाहिए इसी को नाभियन्त्र कहते हैं ॥ ५८–५९ ॥

तत्र तोयमृल्लक्षणम्—

लेहवत्कृतबब्बूलक्वाथेन परिमर्दितम्।
जीर्णकिट्टरजः सूक्ष्मं गुडचूर्णसमन्वितम्।
इयं हि जलमृत्प्रोक्ता दुर्भेद्या सलिलैः खलु ॥ ६० ॥

पुराणे लोहकिट्ट के चूर्ण (मण्डूर चूर्ण) को चूना और गुड़ के साथ मिला-