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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

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DevanagariHindipublished362 pages

Page 330 of 362

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Page 330

२४० रसरत्नसमुच्चये—

निर्मुखजारणालक्षणम्—

निर्मुखा जारणा प्रोक्ता बीजाऽऽदानेन भागशः ॥ ७५ ॥

आगे कहे हुए मुख से रहित (अर्थात् पारद में चतुःषष्ठ्यंश भाग बीज न मिलाया जाय) भिन्न २ जारण में यथानिर्दिष्ट भाग से बीज का मिलाना या प्रक्षेप करना चाहिए, इसी को निर्मुखजारणा कहते हैं ॥ ७५ ॥

अथ बीजादिनिर्देशः—

शुद्धं स्वर्णं च रूप्यं च बीजमित्यभिधीयते ॥ ७६ ॥
शुद्ध स्वर्ण और शुद्ध रूपे को बीज कहते हैं ॥ ७६ ॥

मुखलक्षणम् —

चतुःषष्ठ्यंशतो बीजप्रक्षेपो मुखमुच्यते ॥ ७७ ॥
पारद के अन्दर शुद्ध स्वर्ण या शुद्ध रौप्य को पारद की अपेक्षा ६४ भाग की मात्रा में मिलाने को मुख कहते हैं ॥ ७७ ॥

सम्मुखजारणालक्षणम्—

एवं कृते रसो ग्रासलोलुपो मुखवान् भवेत् ।
कठिनान्यपि लोहानि क्षमो भवति भक्षितुम् ॥
इयं हि सम्मुखा प्रोक्ता जारणा मृगचारिणा ॥ ७८ ॥

इस तरह पारद के अन्दर ६४ वें भाग की मात्रा में बीज के मिला देने पर वह मुखवाला होकर अन्य लोह अभ्रक इत्यादि कठिन धातुओं को ग्रसित (भक्षण) करने के लिये समर्थ हो जाता है, इसी को मृगचारी नाम वाले किसी विद्वान् ने सम्मुखजारणा कही है ॥ ७८ ॥

अथ राक्षसवक्त्ररसलक्षणम्—

दिव्यौषधिसमायोगात्स्थितः प्रकटकोष्ठिषु ।
भुञ्जीताखिललोहाद्यं योऽसौ राक्षसवक्त्रवान् ॥ ७९ ॥

दिव्य औषधियों के साथ या मनःशिला के साथ मिलाकर खुले मुख वाली कोष्ठिका (यंत्र) में यदि पारा रखा जाय तो वह सम्पूर्ण लोहादि धातुओं को अपने अन्दर मिलाने में समर्थ हो जाता है, ऐसे पारद को राक्षसमुखी पारद कहते हैं अर्थात् जैसे राक्षस सबको खा जाता है उसी तरह पारद भी अत्यन्त बुभुक्षित हो जाता है ॥ ७९ ॥