रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in context-अष्टमोऽध्यायः।
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— दीपनलक्षणम् —
धातुपाषाणमूलाद्यैः संयुक्तो घटमध्यगः।
ग्रासार्थं त्रिदिनं स्वेदो दीपनं तन्मतं बुधैः॥ ७० ॥
पारद का दोलायन्त्र के द्वारा धातु, उपधातु, पाषाण या अन्य दीपनद्रव्यों (औषध) के साथ स्वर्णादिक को ग्रास करने की शक्ति बढ़ाने के लिये तीन दिन तक स्वेदन किया जाता है, इसको विद्वान् दीपनसंस्कार कहते हैं ॥ ७० ॥
अथ ग्रासमानम्—
इयन्मानस्य सूतस्य भोज्यद्रव्यात्मिका मितिः।
इयतीत्युच्यते याऽसौ ग्रासमानं समीरितम् ॥ ७१ ॥
इतनी मात्रा में पारद इतनी मात्रा वाले स्वर्ण अभ्रक आदि पदार्थ को ग्रसित कर सकता है, इस प्रकार जो माननिर्देश किया जाता है उसको ग्रासमान कहते हैं ॥७१॥
अथ जरणाभेदनिर्देशः—
ग्रासस्य चारणं गर्भे द्रावणं जारणं तथा।
इति त्रिरूपा निर्दिष्टा जारणावरवार्तिकैः॥ ७२ ॥
ग्रासः पिण्डः परिणामस्तिस्रश्चाख्याः पराः पुनः॥ ७३ ॥
समुखा निर्मुखा चेति जारणा द्विविधा पुनः॥ ७४ ॥
पारद के अन्दर ग्रासयोग्य स्वर्ण आदि का विना अग्नि संयोग के मिलाने को चारण और अग्नि संयोग से ग्रास तथा योग्य पदार्थ को द्रव करके मिलाने को द्रावण तथा रस के अन्दर ग्रासयोग्य द्रवीभूत स्वर्णादिक को मिलाकर विड्यन्त्रादि योग से (किसी काष्ठ औषधि के साथ) पाक करने को जारण कहते हैं। इस तरह रस परिभाषा को बनाने वाले विद्वानों ने तीन प्रकार का जारणसंस्कार कहा है। इसी के अन्य नाम ग्रास (पारद अन्य वस्तु को कवलित कर ले), पिण्ड (पिण्ड स्वरूप का जारण) तथा परिणाम (अवस्थान्तरप्राप्तिरूपजारण) हैं फिर जारणा के संमुखजारणा और निर्मुखजारणा ये दो भेद होते हैं ॥ ७२-७४ ॥
शतावरी शङ्खपुष्पी श्वेतार्कः कनकाह्वयः।
चक्रमर्दः करञ्जश्च ब्रह्मदण्डी शिखण्डिनी ॥ ३ ॥
गुडूची सैन्धवं पाठा मृगाक्षी सोमवल्लिका।
नियामकगणो ह्येषः प्रोक्तो रसविशारदैः ॥ ४ ॥