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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

DevanagariHindipublished362 pages

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सप्तमोऽध्यायः ।
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निर्माण के लिये तथा भेदन आदि शस्त्र कर्म करने के लिए भवननिर्माण करना चाहिए । पश्चिम दिशा में औषधियों का प्रक्षालन, वायव्यदिशा में आर्द्रद्रव्यों को सुखाने का कार्य, उत्तर दिशा में रसेन्द्र का वेधकर्म और सिद्धहुए पदार्थों को जैसे भस्म, रस, घृत, तैल, अवलेह, पाक इत्यादि ईशान कोण में रखना चाहिए ॥ १-४ ॥

अथ रससाधनीयपदार्थाः—
पदार्थसङ्ग्रहः कार्यो रससाधनहेतुकः ।
सत्त्वपातनकोष्ठीं भ्रष्टकोष्ठीं सुशोभनाम् ॥ ५ ॥
भूमिकोष्ठीं चलत्कोष्ठीं जलद्रोण्याऽप्यनेककः ।
भस्त्रिकायुगलं तद्वन्नलिके वंशलोहयोः ॥ ६ ॥
स्वर्णायोधोषशुल्वाश्मकुण्ड्यश्चर्मकृतां तथा ।
करणानि विचित्राणि द्रव्याण्यपि समाहरेत् ॥ ७ ॥
कण्डणीपेषणीस्वल्पाद्रोणीरूपाश्च वर्तुलाः
आयसास्तप्तखल्लाश्च मर्दकाश्च तथाविधाः ॥ ८ ॥
सूक्ष्मच्छिद्रसहस्राढ्या द्रव्यगालनहेतवे ।
चालनी च कटत्राणि शलाका हिच कुण्डली ॥ ९ ॥

रस के साधन करने के लिये जो उत्तम पदार्थ होंउनका संग्रह करना चाहिए । सत्त्वपातन करने की कोष्ठी, सुन्दर आसव तैय्यार करने की कोष्ठी, तैल निकालने की भूमिकोष्ठी तथा इधर उधर आसानी से ले जाने लायक छोटी २ कोठियां, अनेक प्रकार के जल भरने के धातुनिर्मित या मिट्टी के द्रोणाकार पात्र, दो धौंक-नियां, लौह की बनी हुई या बांस की बनी हुई दो नालियां ( भोंगली ) और स्वर्ण, लौह, ताम्र, कांस्य और पत्थर की बनी हुई छोटी २ कुंडियां ( स्थाली ) तथा चर्म के उपकरण और भी अन्य विचित्र तथा औषध कर्म के उपयोगी उपकरण तथा द्रव्यों का सम्पादन करना चाहिए। खाण्डने के लिये ओखली, पीसने के लिये चक्की तथा छोटी २ द्रोणी के स्वरूप की खरलें, गोल खरलें, तप्तखरल, उसी प्रकार के लौह के बने हुए घोटने के हत्थे, औषध चूर्ण के छानने के लिये हजारों छोटे २ सूराखों वाली चलनी और धातुओं को काटने वाली तीखी धार की वस्तुएं, रससिन्दूरादि के पाक करने के लिये चलानेवाली लौह की पतली २ शलाकाएं ( हाटें ) तथा स्थाली और कड़ाह वगैरे के रखने के लिए तृण की बनी