रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in context२१६ रसरत्नसमुच्चये—
जो औषधि रोगी तथा अन्य बहुत से मनुष्यों से जानी हुई होती है वह निर्वीर्य्य हो जाती है इसलिये प्रायः किसी भी औषधि को रोगी या अन्य मनुष्य को नहीं बताना चाहिये ॥ ६३-६४ ॥
इति श्रीकृष्णार्त्मजेन पण्डितप्रवरेण श्रीअम्बिकादत्तशास्त्रिणा विरचितायां
रसरत्नसमुच्चयस्य रत्नोज्ज्वलाख्य-भाषाटीकायां
शिष्योपनयननिरूपणं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥
अथ सप्तमोऽध्यायः ॥
अथ रसशाला—
रसशालां प्रकुर्वीत सर्वबाधाविवर्जिते ।
सर्वौषधिमये देशे रम्ये कूपसमन्विते ॥ १ ॥
यक्षत्र्यक्षसहस्राक्षदिग्विभागे सुशोभने ।
नानोपकरणोपेतां प्राकारेण सुशोभिताम् ॥ २ ॥
शालायाः पूर्वदिग्भागे स्थापयेद्रसभैरवम् ।
वह्निकर्माणि चाग्नेये याम्ये पाषाणकर्म च ॥ ३ ॥
नैर्ऋत्ये शस्त्रकर्माणि वारुणे क्षालनादिकम् ।
शोषणं वायुकोणे च वेधकर्मोत्तरे तथा ॥
स्थापनं सिद्धवस्तूनां प्रकुर्यादीशकोणके ॥ ४ ॥
जो स्थान सर्व प्रकार के विघ्नों से रहित हो, सब तरह की सूखी और आर्द्र औषधियां जहां मिलती हो तथा जो देखने में सुन्दर हो और कूप नदी तालाब से सुशोभित हो ऐसे स्थान में कुवेर की उत्तर दिशा, महादेव का ईशान कोण अथवा इन्द्र की पूर्व दिशा में अनेक प्रकार के औषधि बनाने के उपकरणों से युक्त और चारों ओर घेरा ( प्राकार ) जिस के हो ऐसी रसशाला का निर्माण करना चाहिए । रसशाला की पूर्वदिशा में रस भैरव ( रसलिङ्ग ) की स्थापना करे और आग्नेय कोण में अग्नि सम्बन्धी कार्य जैसे भट्ठियां चूल्हे इत्यादि बनवाना चाहिए । दक्षिणदिशा में शिलापर कल्क का मर्दन आदि पाषाण कर्म करना चाहिए और नैर्ऋत्य कोण में धातुओं की परीक्षा के लिये अथवा यन्त्रादियों के.