रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in context२१० रसरत्नसमुच्चये-
कर्षैकैकं प्रभाते तु सा भवेत्कालिनीसमा ॥ ३५ ॥
एवं शक्तियुतो योऽसौ दीक्षयेत्तं गुरुत्तमः ।
सुस्नातमभिषिञ्चेत् मन्त्रेण कलशोदकैः ॥ ३६ ॥
अघोरामङ्कुशीं विद्यां दद्याच्छिष्याय सद्गुरुः ।
यथाशक्त्या सुशिष्येण दातव्या गुरुदक्षिणा ॥ ३७ ॥
अथाज्ञया गुरोर्मन्त्रं लक्षं लक्षं पृथग्जपेत् ।
“ॐ ह्रां ह्रीं हम् अघोरतरप्रस्फुट २ प्रकट २ कह २ शमय २ जात २ दह २ पातय २ ॐ ह्रीं हैं हौं हम् अघोराय फट्” इममघोरमन्त्रन्तु
“ओम् कामराजशक्तिवीजरसाङ्कुशायै आज्ञया विद्यां रसाङ्कुशाम्” ॥
अनया पूजयेद्देवीं शक्तिमङ्कुशविद्यया ॥ ३८ ॥
यदि उपर्युक्त लक्षणों वाली कालिनी स्त्री न मिल सके तो सुन्दररूपवाली किसी भी तरुण स्त्री को २१ दिन तक एक २ कर्ष शुद्ध गन्धक घृत के साथ प्रातः सेवन कराने से वह स्त्री कालिनी के समान सर्व गुणों से युक्त हो जाती है जो शिष्य इस कालिनी स्त्री के साथ दीक्षाग्रहण करने के योग्य हो तो उत्तम गुरु उसको दीक्षित करे । प्रथम स्नान किये हुए शिष्य को गुरु कलश के जल से मन्त्रों का उच्चारण करते हुए अभिषिक्त करे, फिर सद्गुरु शिष्य को अघोर और अङ्कुशी विद्या का उपदेश दे, और अपनी शक्ति के अनुसार दीक्षा के पश्चात् गुरू जी को दक्षिणा दे कर फिर गुरुजी की आज्ञा से दोनों मन्त्रों का पृथक २ एक लाख जप करना चाहिए। इस अंकुशी विद्या(१) के द्वारा शक्तिस्वरूप देवी का पूजन करे ॥ ३५-३८ ॥
तत्र होमविधिः—
दशांशं जुहुयात्कुण्डे त्रिकोणे हस्तमात्रके ।
जातिपुष्पं त्रिमध्वक्तं पूर्णान्ते कन्यकार्चनम् ॥ ३९ ॥
पूजन करने के पश्चात् एक हाथ चौड़ा त्रिकोण के आकार वाला एक हवन का
( १ ) मूलपाठ में मन्त्र का यह स्वरूप लिखा है । ॐ ह्रां ह्रीं हूम, अघोर तर प्रस्फुट २ प्रकट २ कह २ शमय २ जात २ दह २ पातय २ ॐ ह्रीं ह्रौं हौं हूम, अघोराय फट् इममघोरमन्त्रन्तु ॐ कामराजशक्तिबीजरसाङ्कुशायै आज्ञया विद्या रसाङ्कुशाम् ।