रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in contextषष्ठोऽध्यायः। २०९
रत्न, फल पुष्पों से युक्त दिव्यवस्त्र से वेष्टित (ढका हुआ) एक कलश रसलिङ्ग के सामने स्थापित करके उसको गन्ध, पुष्प, अक्षत और नैवेद्य से अच्छी प्रकार जन करनी चाहिए। फिर पूजन के पश्चात् योनि के समान आकार वाले उत्तम कुण्ड में तिल, घृत, क्षीरान्न, पुष्प, क्षौफ इत्यादि पृथक् २ पदार्थों के द्वारा अघोर रसाङ्कुशीमन्त्र का उच्चारण करते हुए अथवा श्रो अघोरमन्त्र से रसा-ङ्कुशी देवी के निमित्त हवन करना चाहिए। होम हो जाने के पश्चात् वक्ष्यमाण-लक्षणों से युक्त कालिनीशक्ति से युक्त और रस की सिद्धि करने में परायण शिष्य को समीप बुलाना चाहिए ॥ २७-३१ ॥
अथ कालिनीलक्षणम्—
यस्यास्तु कुञ्चिताः केशाः श्यामा या पद्मलोचना ।
सुरूपा तरुणी भिन्ना विस्तीर्णजघना शुभा ॥ ३२ ॥
सङ्कीर्णहृदया पीनस्तनभारेण नम्निता ।
चुम्बनालिङ्गनस्पर्शकोमला मृदुभाषिणी ॥ ३३ ॥
अश्वत्थपत्रसदृशयोनिश्रदेशसुशोभिता ।
कृष्णपक्षे पुष्पवती सा नारी कालिनी स्मृता ॥
रसबन्धे प्रयोगे च उत्तमा सा रसायने ॥ ३४ ॥
जिस स्त्री के घुंघरीले बाल हों और जो श्याम अङ्ग की या सोलह वर्ष की हो तथा कमल के समान विशाल और मनोहर नेत्रों से शोभायमान, सुन्दर लावण्ययुक्त, युवती (यौवनमदोन्मत्त) और प्रस्फुटित योनिरवाली और विस्तीर्ण जंघाओं वाली, शुभलक्षणों से युक्त, संकीर्ण (प्रसन्न) हृदय वाली और जो बड़े २ स्तनों के भार से कुछ झुकी हुई हो तथा चुम्बन, आलिङ्गन और स्पर्श में कोमल प्रतीत होने वाली, मधुर आलाप (भाषण) शील तथा जिस का योनि-प्रदेश पीपल के पत्ते की रचना के समान सुशोभित हो और जो कृष्णपक्ष में रजस्वला होती हो वह स्त्री कालिनी कहलाती है। कालिनी स्त्री रस के बन्धन करने में, प्रयोग में और रसायन में उत्तम होती है ॥ ३२-३४ ॥
अथ कालिन्यभावे तदनुकल्पविधिः—
तदभावे सुरूपा तु या काचित्तरुणाङ्गना ।
तस्या देयं त्रिसप्ताहं गन्धकं घृतसंयुक्तम् ।
रस० १४