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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

DevanagariHindipublished362 pages

Page 287 of 362

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Page 287

पञ्चमोऽध्यायः । १९७

अम्लेन वर्जितं चापि दीपनं पाचनं हितम् ॥ २१४ ॥

वर्तलोह ( भरत ) शीतवीर्य्य, अम्ल, कटु, रूक्ष, कफपित्त और कृमि को नष्ट करता है, त्वचा और नेत्र के विकारों में हितकर तथा रुचिकारक और मल-शोधक होता है तथा भरत के बने हुए पात्र में अम्ल पदार्थ के अतिरिक्त और अन्य सर्व प्रकार के अन्न, शाक, दाल इत्यादि बनाकर खाने से अग्नि अत्यन्त दीप्त होती है तथा पाचकशक्ति भी बढती है ॥ २१३-२१४ ॥

वर्तलोहशोधनम्—
द्रुतमश्वजले क्षिप्तं वर्तलोहं विशुष्यति ॥ २१५ ॥

वर्तलोह को अग्नि पर पिघलाकर तुरन्त ही घोड़े के मूत्र में बुझाने से वह शुद्ध होजाता है ॥ २१५ ॥

वर्तलोहमारणम्—
म्रियते गन्धतालाभ्यां पुटितं वर्तलोहकम् ।
तेषु तेष्विह योगेषु योजनीयं यथाविधि ॥ २१६ ॥
इति वर्तलोहाधिकारः ।

शुद्धवर्त लोह के छोटे २ पत्र या टुकड़े करके उन पर समानभाग गन्धक और शुद्ध हरताल को निम्बू के रस में घोटकर लेप कर देना चाहिए, पश्चात् सम्पुट में बन्द करके गजपुट में सात बार फूंक देना चाहिए, इस तरह बनी भस्म को यथाशास्त्र सर्वप्रयोगों में प्रयुक्त करनी चाहिए ॥ २१६ ॥

अथ रसोपरसलोहानां सूतसाधकत्वनिर्देशः—
जातिमद्भिर्विशुद्धैश्च विधिना परिसाधितैः ।
रसोपरसलोहाद्यैः सूतः सिध्यति नान्यथा ॥ २१७ ॥

जो रस उपरस और लोह उत्तमजाति के हों तथा विधिपूर्वक शुद्ध और भस्म किये गये हों उन्हीं के संसर्ग से पारद सिद्ध होकर शरीर को अजर अमर बनाता है, इनके बिना पारद भी सिद्ध नहीं होता है ॥ २१७ ॥

रत्नादीनां सूतयोग्यत्वनिर्देशः—
रत्नानि लोहानि वराटशुक्तिपाषाणजातं खुरशृङ्गशल्यम् ।
महारसाद्येषु कठोरदेहं भस्मीकृतं स्यात्खलु सूतयोग्यम् ॥२१८॥

सर्वप्रकार के रत्न, लोह (सप्त या अष्ट धातु) कौड़ी, शुक्ति, पाषाणजाति या