रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in context१९६ | रसरत्नसमुच्चये—
के लिये आरोग्य और सुख प्रद है और शरीर के या प्रकृति के लिये सात्म्य होता है ॥ २०७-२०८ ॥
अथ कांस्यशोधनम्—
तप्तं कांस्यं गवां मूत्रे वापितं परिशुध्यति ॥ २०९ ॥
कांसे को अग्नि में प्रतप्त कर गोमूत्र में सातवार बुझानेसे वह शुद्ध होजाता है॥२०९॥
अथ कांस्यमारणम्—
म्रियते गन्धतालाभ्यां निरुत्थं पञ्चभिः पुटैः ॥ २१० ॥
कांस्य के पत्रोंपर निम्बूरस से घोटे हुए गन्धक और मनःशिला का लेपकर पांच पुट देने से उसको निरुत्थ भस्म हो जाती है ॥ २१० ॥
मतान्तरम्—
त्रिक्षारं पञ्चलवणं सप्तधाऽम्लेन भावयेत् ॥
कांस्याऽऽरकूटपत्राणि तेन कल्केन लेपयेत् ।
रुद्ध्वा गजपुटे पक्कं शुद्धभस्मत्वमाप्नुयात् ॥ २११ ॥
इति कांस्याधिकारः ।
सजिखार, ज़वाखार, टङ्कण और पांचो नमक (सौवर्चल, सैन्धव, विड्, औद्भिद, सामुद्र) इनको किसी अम्लरस से सातवार भावित कर कांस्य तथा पीतल के पत्रों पर लेप करके सम्पुट में बन्द कर गज पुट में फूक देने से कांसे या पीतल की उत्तम भस्म हो जाती है॥ २११ ॥
अथ वर्तलोहम्—
वर्तलोहस्वरूपः—
कांस्यार्कर्रीतिलाहाऽहिजातं तद्वर्त्तलोहकम् ।
तदेव पञ्चलोहाख्यं लोहविद्भिरुदाहृतम् ॥ २१२ ॥
कांस्य, ताम्र, पित्तल, लोह, सीस इनको गला कर मिला देने से जो धातु बनती है उस को लोहके विशेषज्ञ वर्तलोह या लोहपञ्च या पञ्चलोह (भरत) कहते हैं॥२१२॥
अथ वर्तलोहगुणाः—
हिमाम्लं कटुकं रूक्षं कफपित्तविनाशनम् ।
रुच्यं त्वच्यं कृमिघ्नं च नेत्र्यं मलविशोधनम् ॥ २१३ ॥
तद्भाण्डे साधितं सर्वमन्नव्यञ्जनसूपकम् ।