रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in contextपञ्चमोऽध्यायः ।
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अथ काकतुण्ड्या गुणाः—
काकतुण्डी गतस्नेहा तिक्तोष्णा कफपित्तनुत् ।
यकृत्प्लीहहरा शीतवीर्या च परिकीर्तिता ॥ १६४ ॥
काकतुण्डी नामक पीतल रूक्ष, कटु, उष्णवीर्य, कफपित्तनाशक और यकृत और प्लीहावृद्धि को नष्ट करती है तथा यह शीतवीर्य होती है ॥ १६४ ॥
अथ शुभरीतिका लक्षणम्—
गुर्वी मृद्वी च पीनाभा साराङ्गो ताडनक्षमा ।
सुस्निग्धा मसृणाङ्गी च रीतिरेतादृशी शुभा ॥ १६५ ॥
जो पीतल वजन मे' भारी, मृदु, पीतवर्णयुक्त, आघात से नहीं टूटने वाली और दृढ, अत्यन्त स्निग्ध तथा मसृण होतो वह पीतल औषध कर्म में श्रेष्ठ है॥ १६५॥
अशुभरीतिका लक्षणम्—
पाण्डुपीता खरा रूक्षा बर्बरा ताडनक्षमा ।
पूतिगन्धा तथा लघ्वी रीतिर्नेष्टा रसादिषु ॥ १६६ ॥
जो पीतल पाण्डुता तथा पीलेवर्ण वाली, खर, रूक्ष, आघात से टूटने वाली, लघु और दुर्गन्ध युक्त हो वह रसादि कर्म मे' श्रेष्ठ नहीं है ॥ १६६ ॥
रीतिकाशोधनम्—
तप्त्वा क्षिप्त्वा च निर्गुण्डीरसे श्यामारजोऽन्विते ।
पञ्चवारेण संशुद्धिं रीतिरायाति निश्चितम् ॥ १६७ ॥
पीतल को अग्नि मे' प्रतप्त कर हरिद्राचूर्ण से युक्त निर्गुण्डी के रस में ५ वार बुझाने से वह निश्चय ही शुद्ध हो जाती है ॥ १६७ ॥
रीतिका मारणम्—
निम्बूरसशिलागन्धवेष्टिता पुटिताऽष्टधा ।
रीतिरायाति भस्मत्वं ततो योज्या यथायथम् ॥ १६८ ॥
शुद्ध पीतल के छोटे छोटे पत्र बनाकर उनकी बराबर शुद्ध गन्धक और मन शिला को निम्बू के रस मे' पीसकर पत्रों पर लेप कर देना चाहिए । फिर सम्पुट मे' बन्द कर पुट देवे', इस तरह आठ पुट देने से पीतल की श्रेष्ठ भस्म हो जाती है । इसको शास्त्रानुसार योगों में प्रयुक्त करना चाहिए ॥ १६८ ॥
रस० १३