रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in context१९२ || रसरत्नसमुच्चये—
त्रिफला के काथ से घोटकर तीस जंगली उपलों के अन्दर पुट देना चाहिए, फिर स्वाङ्गशीत होने के बाद निकालकर खरल में त्रिफलाक्वाथ से घोटकर पुट देवे। इस तरह तीस वार पुट देकर भस्म बनाले, फिर इसभस्म की एक वल्ल ( दो रत्ती ) की मात्रा में समानभाग त्रिकटुचूर्ण और वायविडङ्गचूर्ण मिलाकर शहद और मक्खन के साथ सेवन करने से अस्सी प्रकार के वातरोग, विशेष कर धनुर्वात, सम्पूर्ण कफ के रोग, मूत्र के रोग, श्वास, कास, क्षय, पाण्डु, शोथ, शोत-ज्वर, ग्रहणी, आमदोष, मन्दाग्नि तथा सर्व प्रकार के जलदोष से उत्पन्न रोग भिन्न २ अनुपान के साथ सेवन से नष्ट हो जाते हैं ॥ १८४-१८९ ॥
अथ पित्तलम्—
पित्तलभेदाः—
रीतिका काकतुण्डी च द्विविधं पित्तलं भवेत् ॥ १९० ॥
पीतलधातु दो प्रकार की होती है, एक को रीतिका तथा द्वितीय भेद को काकतुण्डी कहते हैं ॥ १९० ॥
रीतिकालक्षणम्—
सन्ताप्य काञ्जिके क्षिप्ता ताम्राभा रीतिका मता ॥ १९१ ॥
पीतल को अग्नि में तपाकर काञ्जी में बुझाने से यदि वह ताम्बे के रङ्ग की हो जाय तो वह रीतिका पित्तल कहलाता है ॥ १९१ ॥
काकतुण्डी लक्षणम्—
एवं या जायते कृष्णा काकतुण्डीति सा मता ॥ १९२ ॥
पीतल को अग्नि में प्रतप्त कर काञ्जी में बुझाने से यदि वह कृष्णवर्ण की हो जाय तो काकतुण्डी पित्तल कही जाती है ॥ १९२ ॥
अथ रीतिकाया गुणाः—
रीतिस्तिक्तरसा रूक्षा जन्तुघ्नी सास्रपित्तनुत् ।
पाण्डुकुष्ठहरा योगात्सोष्णवीर्या च शीतला ॥ १९३ ॥
रीतिका नाम की पीतल स्वाद में तिक्त, रूक्ष, जन्तुनाशक, रक्तपित्त और कुष्ठ को नाश करनेवाली और पाण्डुरोग नाशक है। शीतल पदार्थों के साथ सेवन करने से शीतवीर्य और उष्ण पदार्थों के साथ उष्णवीर्य है ॥ १९३ ॥