रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in contextपञ्चमोऽध्यायः । | १८५
प्रतप्त कर तब तक बुझावैं जबतक वह स्वयं चूर्ण न हो जाय, बाद में इसे पीसकर भस्म बनाकर प्रयोग करें, यही मण्डूर भस्म है ॥ १५१ ॥
लौहमण्डूरयोर्गुणसाम्यता—
ये गुणा मारिते मुण्डे ते गुणा मुण्डकिट्टे ।
तस्मात्सर्वत्र मण्डूरं रोगशान्त्यै प्रयोजयेत् ॥ १५२ ॥
इत्ययोऽधिकारः ।
जो गुण भस्म किये हुये मुण्ड लोह के सेवन से होते हैं वे ही गुण मुण्ड के किट्ट (मण्डूरभस्म) के सेवन से होते हैं, इसलिये सब जगह रोग की शान्ति के लिये मण्डूरभस्म का प्रयोग करना चाहिए ॥ १५२ ॥
अथ वङ्गनिरूपणम्—वङ्गस्य द्वैविध्यनिर्देशः—
खुरकं मिश्रकं चेति द्विविधं वङ्गमुच्यते ।
खुरं तत्र गुणैः श्रेष्ठं मिश्रकं न हितं मतम् ॥ १५३ ॥
खुरक और मिश्रक भेद से वङ्ग दो प्रकार का होता है, इन दोनों भेदों में से खुरक नाम का वङ्ग श्रेष्ठ है, किन्तु मिश्रक नाम का वङ्ग औषध कार्य में हितकर नहीं है ॥ १५३ ॥
अथ खुरकवङ्गस्य मिश्रकवङ्गस्य च लक्षणम्—
धवलं मृदुलं स्निग्धं द्रुतद्रावं सगौरवम् ।
निःशब्दं खुरवङ्गं स्यात् ; मिश्रकं श्यामशुभ्रकम् ॥ १५४ ॥
जो वङ्ग श्वेत, कोमल, स्निग्ध, वजन में भारी और अग्नि में तपाने पर शीघ्र द्रवित होने वाला तथा औषधियों के स्वरस में तपाकर बुझाने के समय अधिक शब्द न करे वह खुरक नाम का वङ्ग होता है । जो वङ्ग उक्त लक्षणों से विपरीत और श्वेत तथा काले रङ्ग का हो वह मिश्रक कहलाता है ॥ १५४ ॥
अथ वङ्गगुणाः—
वङ्गं तिक्तोष्णकं रूक्षमीषद्वातप्रकोपनम् ।
मेहश्लेष्मामयघ्नं च मेदोघ्नं कृमिनाशनम् ॥ १५५ ॥
वङ्ग तिक्त, उष्ण, रूक्ष और कुछ वात को कुपित करने वाला है तथा प्रमेह, श्लेष्मा (कफ) के विकार, क्रिमिजन्यरोग और मेदा को नष्ट करता है ॥ १५५ ॥