रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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नष्ट करता है और हृदय में पीड़ा उत्पन्न करता है, शरीर को शिथिल कर देता है और रोग उत्पन्न करता है, इसलिये प्रथम लौह का उत्तम शोधनकर पश्चात् मारण करना चाहिए ॥ १४७ ॥
अथोत्तरोत्तरमधिकगुणकरं लोहम्—
किट्टाद्दशगुणं मुण्डं मुण्डात्तीक्ष्णं शतोन्मितम् ।
तीक्ष्णाल्लक्षगुणं कान्तं भक्षणात्कुरुते गुणान् ।
तस्मात्कान्तं सदा सेव्यं जरामृत्युहरं नृणाम् ॥ १४८ ॥
आयुष्प्रदाता बलवीर्यकर्ता रोगप्रहर्ता मदनस्य कर्ता ।
अयःसमानं न हि किञ्चिदन्यद्रसायनं श्रेष्ठतमं हि जन्तोः ॥ १४९ ॥
किट्ट लौह से मुण्ड दसगुना लाभ कारक है और मुण्ड से तीक्ष्ण सौगुना अधिक लाभ करता है और तीक्ष्ण से कान्त लौह के सेवन के करने से लक्षगुणाधिक फल करता है, इसलिये सर्वदा जरा और मृत्यु को हरण करने वाले कान्त लौह का ही मनुष्यों को सेवन करना चाहिए । कान्त लौह आयु को बढाता है, बल, वीर्य और काम शक्ति को उत्पन्न करता है, रोगों को नष्ट करता है, इसलिये प्राणिमात्र के लिये लौह के समान गुणकारी अन्य कोई रसायन नहीं है ॥ १४८–१४९ ॥
अथ मण्डूरम्—
मण्डूरशोधनम्—
अक्षाङ्गारैर्धमेत्किट्टं लोहजं तद्गवां जलैः ।
सेचयेत्तत्पात्रान्तः सप्तवारं पुनः पुनः ।
मण्डूरोऽयं समाख्यातश्चूर्णं श्लक्ष्णं प्रयोजयेत् ॥ १५० ॥
लौह से उत्पन्न किट्ट (मल) को बहेड़े की अग्नि में प्रतप्त कर गोमूत्र से भरे हुए बहेड़े के पात्र में सात वार बुझाने से मण्डूर शुद्ध होजाता है पश्चात् इसका महीन चूर्ण करके भस्म बनाकर योगों में प्रयोग करे ॥ १५० ॥
मतान्तरम्—
गोमूत्रैस्त्रिफला काथ्या तत्क्वाथे सेचयेच्छनैः ।
लोहकिट्टं सुसन्तप्तं यावज्जीर्यति तत्स्वयम् ।
तच्चूर्णं जायते पेष्यं मण्डूरोऽयं प्रयोजयेत् ॥ १५१ ॥
अथवा गोमूत्र में त्रिफला का क्वाथ बनाकर इस क्वाथ में मण्डूर को अत्यन्त