Skip to content
SarvaKosh
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

DevanagariHindipublished362 pages

Page 265 of 362

Read in context
Page 265

पञ्चमोऽध्यायः । १७५

कान्तं कोटिगुणं तत्रं तदप्येवं गुणोत्तरम् ॥ १०० ॥
मुण्डादि प्रत्येक लौह उत्तरोत्तर एक दूसरे से लक्षाधिक गुणों वाले हैं और उनमें कान्त लौह करोड़ से भी अधिक गुण वाला है। इसमें भी मन्त्रजप पूर्वक मारित कान्त लौह करोड़ गुण से भी अधिक गुण प्रद होता है ॥ १०० ॥

अथ सर्वलौहशुद्धिः
शशक्षतजसंलिप्तं त्रिवारं परितापितम् ।
मुण्डादिसकलं लोहं सर्वदोषान्विमुञ्चति ॥ १०१ ॥
मुण्ड आदि सर्व प्रकार के लौह के छोटे २ टुकड़ों को खरगोश के रुधिर से लिप्त-कर अग्नि में तपाने से उनकी शुद्धि हो जाती है। यह क्रिया तीन बार करनी चाहिए ॥१०१॥

लोहस्थगिरिजदोषनाशनविधिः—
क्वाथ्यमष्टगुणे तोये त्रिफलाषोडशं पलम् ।
तत्क्वाथे पादशेषे तु लोहस्य पलपञ्चकम् ॥ १०२ ॥
कृत्वा पत्राणि तप्तानि सप्तवारं निषेचयेत् ।
एवं प्रलीयते दोषोगिरिजो लोहसम्भवः ॥ १०३ ॥
अथवा १६ पल (६७ तो० त्रिफला) (क्वाथ्य) को आठगुने ( १२८ पल का ५१२ तो० या ६ सेर डेढ़ पाव २ तोले) जल में उबाल कर चतुर्थांश (३२ पल) शेष रख कर क्वाथ बना लो, पश्चात् ५ पल लौहे के सूक्ष्मपत्र या टुकड़े कर उन्हें प्रतप्त कर उस क्वाथ में बुझा लो । इस तरह सात बार बुझाने से लौहे के सर्व दोष(१) नष्ट हो जाते हैं ॥ १०२–१०३ ॥

ध्यान रहे कि ३२ पल क्वाथ के सात भाग करके उसमें लौह को सात बार बुझाना चाहिए, प्रथम बार बुझाये क्वाथको फेंककर दूसरा क्वाथ लेकर उसमें दूसरी बार बुझाना चाहिए । सात भाग करने पर प्रत्येक भागमें क्वाथ की मात्रा ९ तोले के करीब होती है । किसी आचार्य के मत से एक पल आठ तोले का होता है ।

मतान्तरम्—
सामुद्रलवणोपेतं तप्तं निर्वापितं खलु ।
त्रिफलाक्वथिते नूनं गिरिदोषमयस्त्यजेत् ॥ १०४ ॥


( १ ) यथा-गुरुता हृद्योत्क्लेदः कश्मलं दाहकारिता ।
,, अश्मदोषः सुदुर्गन्धो दोषाः सप्तायसस्य तु ॥