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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

DevanagariHindipublished362 pages

Page 264 of 362

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Page 264

१७४ | रसरत्नसमुच्चये—

अथ कान्तलौहगुणाः—

कान्तायोऽतिरसायनोत्तरतरं स्वस्थे चिरायुःप्रदं
स्निग्धं मेहहरं त्रिदोषशमनं शूलाऽऽममूलापहम् ।
गुल्मप्लीहयकृत्क्षयामयहरं पाण्डूदरव्याधिनु-
त्तिक्तोष्णं हिमवीर्यकं किमपरं योगेन सर्वार्त्तिनुत् ॥ ९६ ॥

कान्त लौह अत्यन्त श्रेष्ठ रसायन है, स्वस्थ शरीर वाले मनुष्य की आयु को बढाता है, स्निग्ध है तथा प्रमेह, त्रिदोष प्रकोप, शूल, आम, बवासीर, गुल्म, प्लीहा, यकृत, क्षय, पाण्डु तथा उदररोग को नष्ट करता है। यह स्वाद में तिक्त, उष्ण तथा शीतवीर्य है और भिन्न २ योगों के साथ मिलाकर सेवन करने से सब रोगों को नष्ट करता है। इससे बढकर दूसरा कोई श्रेष्ठ रसायन नहीं है ॥ ९६ ॥

लौहकल्पश्रेष्ठता—

सम्यगौषधकल्पानां लोहकल्पः प्रशस्यते ।
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन शुद्धं लोहं च मारयेत् ॥ ९७ ॥

अच्छे २ औषध कल्पो में लौह कल्प ही प्रशस्त है इसलिये यत्नपूर्वक कान्त लौह की साधारण और विशेष शुद्धि कर के मारण करना चाहिये ॥ ९७ ॥

अथ मारणार्थं लोहस्य परिमाणनिर्देशः—

नाधः पचेत्पञ्चपलादर्वागूर्ध्वं त्रयोदशात् ॥ ९८ ॥

पाञ्च पल से कम और तेरह पल से ज्यादा लौह को एक वार में भस्म के लिये नहीं लेना चाहिये ॥ ९८ ॥

अथ लोहमारणे मन्त्रः(१)—

आदौ मन्त्रस्ततः कर्म कर्त्तव्यं मन्त्र उच्यते ॥ ९९ ॥

लौह मारण के प्रथम मन्त्र का जप कर के फिर मारण कर्म करना चाहिए नीचे मन्त्र कहा जाता है ॥ ९९ ॥

अथ लौहत्रयाणामुत्तरोत्तरगुणाधिक्यम्—

लक्षोत्तरगुणं सर्वं लोहं स्यादुत्तरोत्तरम् ।


( १ ) “ॐ अमृतोद्भवाय स्वाहा”
अनेन मन्त्रेण लोहमारणम् ।
“ॐ अमृतोद्भवाय स्वाहा” इस मन्त्र का जप कर के लौह का मारण करना चाहिए।