रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in contextपञ्चमोऽध्यायः । १७१
खरलौहगुणाः—
रूक्षं स्यात्खरलोहकं समधुरं पाकेऽथ वीर्ये हिमं
तिक्तोष्णं कफपित्तकुष्ठजठरप्लीहामपाण्ड्वर्तिनुत् ॥
सद्यः शूलयकृद्गदक्षयजरामेहामवातापहं
दीप्तं चातिरसायनं बलकरं दुर्नामदाहापहम् ॥ ८१ ॥
खर लौह के गुण—यह रूक्ष, पाक में मधुर, शीतवीर्य, तिक्त और उष्ण होता है तथा कफ, पित्त, कुष्ठ, उदररोग, प्लीहा, आन, पाण्डु, शूल, यकृत, राजयक्ष्मा, जरा, प्रमेह, आमवात, अर्श और दाह को नष्ट करता है तथा यह अत्यन्त रसायन, अग्नि दीपक और बल कारक होता है ॥ ८१ ॥
अन्यसारादितीक्ष्णलौहगुणाः—
खरलोहात्परं सर्वमेकैकस्माच्छतोत्तरम् ॥ ८२ ॥
तीक्ष्ण लौह के अन्यभेद खरसंज्ञक लौह की अपेक्षा क्रमशः सौ सौ गुना अधिक गुणप्रद होते हैं ॥ ८२ ॥
कान्तलौहभेदाः—
भ्रामकं चुम्बकं चैव कर्षकं द्रावकं तथा ।
एवं चतुर्विधं कान्तं रोमक़ान्तं च पञ्चमम् ॥ ८३ ॥
एकद्वित्रिचतुष्पञ्चसर्वतोमुखमेव तत् ।
पीतं कृष्णं तथा रक्तं त्रिवर्णं स्यात्पृथक् पृथक् ।
क्रमेण देवतास्तत्र ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ॥ ८४ ॥
भ्रामक, चुम्बक, कर्षक, द्रावक ये कान्तलोहे के चार भेद हैं तथा पांचवां भेद रोमक है। किसी के एक मुख, किसी के दो मुख, किसी के तीन मुख और किसी के चार तथा पाँच मुख होते हैं और किसी के सबमुख होते हैं। इस तरह मुखभेद से कान्त लौह के छ भेद हैं और प्रत्येक पीत, कृष्ण, रक्त वर्ण भेद से तीन तीन तरह का होता है और क्रम से पीत वर्ण के लौह के ब्रह्मा, कृष्णवर्ण लोहे के विष्णु और रक्तवर्ण लोहे के महेश्वर अधिष्ठातृ देवता हैं ॥ ८३-८४ ॥
वर्णानुसारकार्यभेदाः—
स्पर्शवेधि भवेत्पीतं कृष्णं श्रेष्ठं रसायने ।
रक्तवर्णं तथा चापि रसबन्धे प्रशस्यते ॥ ८५ ॥