रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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सारलौहलक्षणम्—
वेगभङ्गुरधारं यत्सारलोहं तदीरितम् ।
पोगराभासकं पाण्डुभूमिजं सारमुच्यते ॥ ७६ ॥
जिस लौह की धार प्रबल आघात से टूट या मुड़ जाय उसे सार लौह कहते हैं। इसमें टेढ़ी रेखाएं स्पष्ट प्रतीत होती हैं तथा यह पीली भूमि से उत्पन्न होता है ॥७६॥
हृन्नाललौहलक्षणम्—
कृष्णपाण्डुवपुश्चञ्चुबीजतुल्लोरुपोगरम् ।
छेदने चातिपरुषं हृन्नालमिति कथ्यते ॥ ७७ ॥
जो लौह कुछ अथवा पूर्ण कृष्णता लिये पाण्डुवर्ण का हो तथा एरण्ड (रेड़ी) के बीज के छिलके की रेखाओं के समान स्पष्ट रेखाओं से युक्त हो और तोड़ने पर अत्यन्त कठिन हो उसको हृन्नाल लौह कहते हैं ॥ ७७ ॥
सपर्यायपोगरलक्षणम्—
अङ्गक्षया च वङ्गं च पोगरस्याभिधात्रयम् ।
चिकुरं भङ्गुरं लोहात्पोगरं तत्परं मतम् ॥ ७८ ॥
उपर्युक्त पोगर के अङ्ग, क्षय (छाया) और वङ्ग ये तीन पर्याय वाचक शब्द हैं। लौह में पोगर टूटने वाला और चमकदार होता है ॥ ७८ ॥
वाजीरलौहलक्षणम्—
पोगरैर्वज्रसङ्काशैः सूक्ष्मरेखैश्च सान्द्रकैः ।
निचितं श्यामलाङ्गं च वाजीरं तत्प्रकीर्त्यते ॥ ७९ ॥
जिस लौह में पोगर वज्र के समान कठिन, चमकदार और सान्द्र (अत्यन्त मिली हुई) छोटी २ रेखाओं से युक्त हो और जिसका वर्ण श्याम हो उसको वाजीर लौह कहते हैं ॥ ७९ ॥
काललौहलक्षणम्—
नीलकृष्णप्रभं सान्द्रं मसृणं गुरु भासुरम् ।
लोहाघातेऽप्यभङ्गात्मधारं कालायसं मतम् ॥ ८० ॥
जो लौह नीलिमा लिये काले वर्ण का हो तथा भारी, चिकना, कान्ति युक्त और लौह के घन के आघात से भी जिसकी धार न टूटे उसको काल लौह कहते हैं ॥ ८० ॥