रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
Page 245 of 362
Read in contextपञ्चमोऽध्यायः । १५५
महादेवजी के वीर्य को अग्निदेवता ने पान कर असह्य होने के कारण बाहर निकाल दिया वही वह्नि से उत्पन्न सुवर्ण कहलाया ॥ ५ ॥
स्वर्णत्रयगुणाः—
एतत्स्वर्णत्रयं दिव्यं वर्णैः षोडशभिर्युतम् ।
धारणादेव तत्कुर्याच्छरीरमजरामरम् ॥ ६ ॥
ये तीनों प्रकार के सुवर्ण दिव्य शक्तियों से युक्त और सोलह कलाओं से सम्पन्न हैं, इनके केवल धारण करने से शरीर अजर अमर हो जाता है ॥ ६ ॥
खनिजस्वर्णोत्पत्तितल्लक्षणगुणाश्च—
तत्र तत्र गिरीणां हि जातं खनिषु यद्भवेत् ।
तच्चतुर्दशवर्णाढ्यं भक्षितं सर्वरोगहृत् ॥ ७ ॥
विन्ध्य सुमेरु हिमालयादि पर्वतों की खानों में उत्पन्न हुआ सुवर्ण खनिज सुवर्ण कहलाता है । वह चौदह कलाओं से युक्त होता है तथा सेवन करने से सब रोगों को नष्ट करता है ॥ ७ ॥
वेधजस्वर्णोत्पत्तिर्गुणाश्च—
रसेन्द्रवेधसम्भूतं तद्वेधजमुदाहृतम् ।
रसायनं महाश्रेष्ठं पवित्रं वेधजं हि तत् ॥ ८ ॥
पारद के वेधन कर्म से उत्पन्न सुवर्ण रसेन्द्रवेधसञ्जात सुवर्ण कहलाता है । यह रसायन है, औषध कर्म में उत्तम तथा पवित्र है ॥ ८ ॥
स्वर्णरौप्ययोःसामान्यगुणाः—
आयुर्लक्ष्मीप्रभाधीस्मृतिकरमखिलव्याधिविध्वंसि पुण्यं
भूतावेशप्रशान्तिस्मरभरसुखदं सौख्यपुष्टिप्रकाशि ।
गाङ्गेयं चाथ रूप्यं गदहरमजराकारि मेहापहारी
क्षीणानां पुष्टिकारि स्फुटमतिकरणं वीर्यवृद्धिप्रकारि ॥ ९ ॥
यह स्वर्ण आयु, शोभा, कान्ति, बुद्धि और स्मृति को उत्पन्न करता है, सम्पूर्ण व्याधियों को नष्ट करता है, पवित्र है, भूत प्रेतों के आवेश को दूर करता है, भोग शक्ति को बढाता है, सौख्य और पुष्टि करता है । गाङ्गेय सुवर्ण की तरह चांदी भी रोगों को हरती है, शरीर को अजर ( बुढापारहित ) करती है और