रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in context१५४ रसरत्नसमुच्चये—
रूक्मलोह ये तीनों तृतीय जाति के मिश्र लोह हैं। लुह धातु को लोह अर्थ (कन-करजत के लिये) में या आकर्षण अर्थ में प्रयोग करते हैं क्योंकि सप्त या अष्ट लोह (कनकादिक) भी दोषों को खींच कर निकाल देते हैं और लोह शब्द भी अगुरूलोहित सुवर्णादि अनेक अर्थों का वाचक है ॥ १ ॥
अथ स्वर्णम्—स्वर्णभेदाः—
प्राकृतं सहजं वह्निसम्भूतं खनिसम्भवम् ।
रसेंद्रवेधसञ्जातं स्वर्णं पञ्चविधं स्मृतम् ॥ २ ॥
सुवर्ण १ प्राकृत, २ सहज, ३ वह्नि से उत्पन्न, ४ खनिज से उत्पन्न, रसेन्द्र के वेध (खेदनादिक) से उत्पन्न, इस प्रकार यह पाँच तरह का होता है ॥ २ ॥
अथ प्राकृतस्वर्णस्योत्पत्तिः—
ब्रह्माण्डं संवृतं येन रजोगुणभुवा खलु ।
तत्प्राकृतमिति प्रोक्तं देवानामपि दुर्लभम् ॥ ३ ॥
रजोगुण से उत्पन्न हुए जिस सुवर्ण से ब्रह्माजी का आधारभूत स्वर्णमय अण्ड(१)या ब्रह्माण्ड (संसार) पैदा हुआ वह प्राकृत सुवर्ण है और वह देवताओं के लिये भी दुर्लभ है ॥ ३ ॥
अथ सहजस्वर्णोत्पत्तिः—
ब्रह्मा येनाऽवृता जातः सुवर्णेन जरायुणा ।
तन्मेरुरूपतां यातं सुवर्णं सहजं हि तत् ॥ ४ ॥
जिस सुवर्ण की जरायु से वेष्टित ब्रह्माजी उत्पन्न हुये वह सुवर्ण मेरुपर्वत के रूप में परिणत हुआ, उसी को स्वाभाविक (सहज) सुवर्ण कहते हैं ॥ ४ ॥
वह्निजस्वर्णोत्पत्तिः—
विसृष्टमग्निना शवं तेजः पीतं सुदुःसहम् ।
अभूत्सर्व्वसमुद्दिष्टं सुवर्णं वाह्निसम्भवम् ॥ ५ ॥
( १ ) सोऽभिध्याय शरीरात् खात् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः ।
अत एव ससर्जादौ तासु बीजमवासृजत् ॥
तदण्डमभवद्धैमं सहस्रांशुसमप्रभम् ।
तस्मिन् जज्ञे स्वयं ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः ॥