Skip to content
SarvaKosh
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished362 pages

Page 241 of 362

Read in context
Page 241

चतुर्थोऽध्यायः । १५१

इस उपर्युक्त द्रुति को लोहाष्टक (स्वर्ण, रोप्य, ताम्र, वङ्ग, सीस, पित्तल, कान्तलौह, तीक्ष्ण लोह) में या हीरे की भस्म में डालकर स्वेदन करने से उन लोहों का तथा हीरे का द्रवण हो जाता है। यह इस वैक्रान्त द्रुति का प्रभाव है और यह द्रुति अन्य रत्नों का भी द्रवण कर देती है ॥ ७३-७४ ॥

अथ राजावर्तः—उत्तममध्यमराजावर्तलक्षणम्—
राजावर्तोऽल्परक्तोरुनीलिकामिश्रितप्रभः ।
गुरुश्च मसृणः श्रेष्ठस्तदन्यो मध्यमः स्मृतः ॥ ७५ ॥
राजावर्त कुछ लाल और अधिक नीले रंग का होता है जो राजावर्त वजन में भारी और कोमल या स्निग्ध हो वह श्रेष्ठ है विपरीत मध्यम होता है ॥ ७५ ॥

अथ गुणाः—
प्रमेहक्षयदुर्नामपाण्डुश्लेष्मानिलापहः ।
दीपनः पाचनो वृष्यो राजावर्तो रसायनः ॥ ७६ ॥
यह बीस प्रकार के प्रमेह, क्षय, अर्श, पाण्डु और वात तथा कफ के विकारों को नष्ट करता है तथा दीपन, पाचन, वृष्य और रसायन होता है ॥ ७६ ॥

राजावर्तादिसामान्यशोधनम्—
निम्बुद्रवैः सगोमूत्रैः सक्षारैः स्वेदिता खलु ।
द्वित्रिवारेण शुद्ध्यन्ति राजावर्तादिधातवः ॥ ७७ ॥
निम्बूके रस में यवक्षार और गोमूत्र मिलाकर दोलायन्त्र द्वारा राजावर्त तथा अन्यधातुओं को दो या तीन वार एक २ प्रहर तक स्वेदन करने से वे शुद्ध हो जाते हैं ॥ ७७ ॥

अथ राजावर्तशोधनम्—
शिरीषपुष्पार्द्ररसैः राजावर्तं विशोधयेत् ॥ ७८ ॥
राजावर्त शिरीषपुष्प और अद्रक के स्वरस में स्वेदन करने से शुद्ध हो जाता है ॥ ७८ ॥

अथ राजावर्तमारणम्—
लुङ्गाम्बुगन्धकोपेतो राजावर्तो विचूर्णितः ।
पुटनात्सप्तवारेण राजावर्तो मृतो भवेत् ॥ ७९ ॥
राजावर्तभस्म—राजावर्त को समान भाग गन्धक के साथ निम्बू के रस से घोटकर शराव में सम्पुटकर सात वार पुट देने से मृत हो जाता है ॥ ७९ ॥