रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in context२५० | रसरत्नसमुच्चये—
सप्ताहादुद्धृतं चैव पुटं दत्वा द्रुति हरेत् ॥ ६९ ॥
मोती चूर्ण को सात दिन तक अम्लवेत के रस से घोटकर गोला बनाकर बड़े निम्बू के बीच में चीर कर रख दें, फिर उस निम्बू को डोरे से बांधकर धान के ढेर में गाड़ दें, सात दिन के बाद जम्बीर को निकाल कर मूषायन्त्र में बन्द करके गजपुट दे देवें । फिर द्रुति ग्रहण करें ॥ ६९ ॥
वज्रद्रावणविशेषविधिः—
वज्रवल्ल्यन्तरस्थं च कृत्वा वज्रं निरोधयेत् ।
अम्लभाण्डगतं स्वेद्यं सप्ताहाद्द्रवतां व्रजेत् ॥ ७० ॥
शुद्ध हीरे को अस्थिसंहारी (हड़जोड़) के जड़के बीच में गढ़ा (खात) कर रख दें और डोरे से अच्छी प्रकार बन्द कर दें, और दोला यन्त्र में अम्लवर्ग के पदार्थों का रस भरकर सात दिन तक स्वेदन करें तो हीरे का द्रव हो जाता है ॥ ७० ॥
अथ वैक्रान्तद्रावणे विशेषक्रमः—
श्वेतवर्णं तु वैक्रान्तमम्लवेतसभावितम् ।
सप्ताहान्नात्र सन्देहः खरघर्मे द्रुवत्यलम् ॥ ७१ ॥
श्वेत वैक्रान्त के चूर्ण को अम्लवेत के रस की भावना देकर घोट कर तीव्र धूप में सुखावें । इस तरह सात दिन भावना देकर सुखाने से वैक्रान्त की द्रुति हो जाती है ॥ ७१ ॥
अन्यविधिः—
केतकीस्वरसं ग्राह्यं सैन्धवं स्वर्णपुष्पिका ।
इन्द्रगोपकसंयुक्तं सर्वं भाण्डे विनिक्षिपेत् ।
सप्ताहं स्वेदयेत्तस्मिन्वैक्रान्तं द्रवतां व्रजेत् ॥ ७२ ॥
अथवा केवड़े का स्वरस, सेंधानमक, स्वर्ण क्षीरी या कटेरी और इन्द्रगोप (वीर बहूटी) इन को पीस कर भाण्ड में भर दें फिर उसमें वैक्रान्त डालकर सात दिन तक स्वेदन करने से वैक्रान्त की द्रुति हो जाती है ॥ ७२ ॥
अन्यविधिः—
लोहाष्टके तथा वज्रे वापनात्स्वेदनाद्द्रुतिः ।
जायते नात्र सन्देहो योगस्यास्य प्रभावतः ॥ ७३ ॥
कुरुते योगराजोऽयं रत्नानां द्रावणं परम् ॥ ७४ ॥