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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

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DevanagariHindipublished362 pages

Page 236 of 362

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Page 236

१४६ रसरत्नसमुच्चये—

वृष्य और अग्निदीपक है। नील को शरीर में धारण करने से पाप भी नष्ट होते हैं॥५२॥

अथ गोमेदः—गोमेदधिरुक्तिः—

गोमेदः समरागत्वान्गोमेदं रत्नमुच्यते ॥ ५३ ॥

गायके मेद के समान वर्ण होने से या रत्नों के समान वर्ण होने से गोमेद को गोमेदरत्न कहते हैं ॥ ५३ ॥

प्रशस्तगोमेदलक्षणम्—

सुस्वच्छंगोजलच्छायं स्वच्छं स्निग्धं समं गुरु ।
निर्दलं मसृणं दीप्तं गोमेदं शुभमष्टधा ॥ ५४ ॥

जो अत्यन्त स्वच्छ और गोमूत्र के समान कान्ति युक्त हो, स्निग्ध तथा समानाकार हो, पत्ररचना रहित, मसृण, तोल में भारी तथा प्रकाशमान हो इस तरह आठ लक्षणों वाली गोमेद शुभ होती है ॥ ५४ ॥

हेयगोमेदलक्षणम्—

विच्छायं लघु रूक्षाङ्गं चिपिटं पटलान्वितम् ।
निष्प्रभं पीतकाचाभं गोमेदं न शुभावहम् ॥ ५५ ॥

जो गोमेद तेज रहित, लघु, स्पर्श में रूक्ष, चिपटाकार, पत्र रचना युक्त, प्रभारहित और पीले काच के समान हो वह अशुभ है ॥ ५५ ॥

अथ गुणाः—

गोमेदं कफपित्तघ्नं क्षयपाण्डुक्षयङ्करम् ।
दीपनं पाचनं रुच्यं त्वच्यं बुद्धिप्रबोधनम् ॥ ५६ ॥

गोमेद कफ, पित्त, पाण्डु, तथा क्षय को नष्ट करती है और दीपन, पाचन, रुचिवर्द्धक, बुद्धिप्रबोधक तथा चर्म हितकर है ॥ ५६ ॥

अथ क्षेपकश्लोकाः—
रत्नमारणनिषेधः—

रत्नानां शोधनं श्रेष्ठं मारणं न गुणप्रदम् ।
भस्मना वीर्यहानिः स्यात्तस्मात्तानि च शोधयेत् ॥ १ ॥

कुछ विद्वानों का मत है कि रत्नों का शोधन कर गुलाब पुष्पों के स्वरस (गुलाबजल) में घोट कर पिष्टि बनाकर प्रयोग करना चाहिए । इनकी भस्म करने से विशेष लाभ नहीं होता है अपि तु इन की भस्म बनाने से इन के प्रभाव की हानि होती है ॥ १ ॥