रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in contextचतुर्थोऽध्यायः । १४५
अथ नीलनिरूपणम्—नीलभेदाः—
जलनीलेन्द्रनीलं च शक्रनीलं तयोर्वरम् ॥ ४८ ॥
नीलम के जलनील और इन्द्रनील ये दो भेद हैं इन दोनों में इन्द्रनील उत्तम होती है, ॥ ४८ ॥
जलशक्रनीलयोःस्वरूपम्—
श्वैत्यगर्भितनीलाभं लघु तज्जलनीलकम् ।
कार्ष्ण्यगर्भितनीलाभं सभारं शक्रनीलकम् ॥ ४९ ॥
जो नील बीच में श्वेत हो और बाहर से नीलवर्ण युक्त हो और हलकी हो वह जलनील कहलाती है और जो मध्य में काले रङ्ग की हो और बाहर से अत्यन्त नील वर्ण युक्त हो तथा भारी हो वह इन्द्रनील कहलाती है ॥ ४९ ॥
श्रेष्ठनीललक्षणम्—
एकच्छायं गुरु स्निग्धं स्वच्छं पिण्डितविग्रहम् ।
मृदु मध्ये लसज्ज्योतिः सप्तधा नीलमुत्तमम् ॥ ५० ॥
जो नील एक सी छायावाली या अपने में अन्य वस्तु का प्रतिबिम्ब न बना सके, भारी, स्निग्ध, स्वच्छ, आकार में पिण्डस्वरूप हो और मृदु तथा दीप्त तेज युक्त इन सात लक्षणों से युक्त हो वह इन्द्रनील श्रेष्ठ है ॥ ५० ॥
श्रेष्ठनीललक्षणम्—
कोमलं विहितं रूक्षं निर्भारं रक्तगन्धि च ।
चिपिटाभं ससूक्ष्मं च जलनीलं हि सप्तधा ॥ ५१ ॥
जो नील कोमल, रूक्ष, भार रहित, लालवर्णयुक्त या रक्त की गन्ध आती हो, चपटी हो तथा अत्यन्त सूक्ष्म हो, तथा आधी में एक रङ्ग और आधी में अन्य रङ्ग हो, इस तरह सात लक्षण जिसमें हों वह जलनील कहलाती है ॥ ५१ ॥
अथ गुणाः—
श्वासकासहरं वृष्यं त्रिदोषघ्नं सुदीपनम् ।
विषमज्वरदुर्नामपापघ्नं नीलमीरितम् ॥ ५२ ॥
नीलम—श्वास, कास, त्रिदोष, विषमज्वर और अर्श को नष्ट करती है तथा
४७ वें श्लोक में कहे हुए षड्गुण—
गुणाः—विद्या वितर्को विज्ञानं स्मृतिस्तत्परताक्रिया ।
यस्यैते षड्गुणास्तस्य न साध्यमति वर्तते ॥ इति चरकः
रस० १०