रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in context१२२ रसरत्नसमुच्चये—
है उसे लेना चाहिए तथा क्वाथ और चूर्णादि प्रक्रिया में भावप्रकाशोक्त रसाञ्जन का ग्रहण करें।
स्रोतोऽञ्जन— यह अन्टीमनी सल्फाइड (Antimony Sulphide) है। बर्मा और मैसूर में थोड़ा अन्टीमनी सल्फाइड प्राप्त होता है। आजकल सफेद सुरमे के नाम से बाजारों में जो द्रव्य मिलता है वह केलसाइट है उसे नहीं लेना चाहिए। वह चूने की जाति का एक पत्थर है स्रोतोऽञ्जन नहीं है।
पुष्पाञ्जन— यह Zinc oxide जिन्क आक्साइड है। इसे सफेदा भी कहते हैं। यह जैपुर में बहुत बनता है तथा आजकल पाश्चात्य चिकित्सक नेत्र के लिये यशद के योगों का अत्यन्त प्रयोग करते हैं।
नीलाञ्जन— यह लेड सल्फाइड (Lead sulphide) या गेलेना है। यह भी नेत्र के लिये हितकर है तथा बर्मा से अधिक आता है।
सौवीराञ्जनगुणाः—
सौवीरमञ्जनं धूम्रं रक्तपित्तहरं हिमम् ।
विषहिध्माक्षिरोगघ्नं व्रणशोधनरोपणम् ॥ १०२ ॥
अब प्रत्येक का वर्णन करते हैं—सौवीराञ्जन धूम्र वर्ण का होता है। यह रक्तपित्त, विष, हिचकी और नेत्र के रोगों को नष्ट करता है तथा शीतल होता है, व्रण का शोधन करके भर देता है ॥ १०२ ॥
रसाञ्जनगुणाः—
रसाञ्जनञ्च पीताभं विषवक्त्रगदापहम् ।
श्वासहिध्मापहं वर्ण्यं वातपित्तास्रनाशनम् ॥ १०३ ॥
रसाञ्जन कुछ पीले वर्ण का होता है। यह विषवाधा, मुखरोग, श्वास, हिचकी वातरक्त तथा रक्तपित्त को नष्ट करता है और वर्ण बढ़ाता है ॥ १०३ ॥
स्रोतोऽञ्जनगुणाः—
स्रोतोऽञ्जनं हिमं स्निग्धं कषायं स्वादु लेखनम् ।
नेत्र्यं हिध्माविषच्छर्दिकफपित्तास्ररोगनुत् ॥ १०४ ॥
स्रोतोऽञ्जन शीत, स्निग्ध, कषाय, स्वादु तथा लेखन होता है। नेत्रों का हितकारक है और हिचकी, विषबाधा, वमन, कफ, रक्तपित्त इन रोगों को नष्ट करता है ॥ १०४ ॥
लेखनस्वरूपं—
धातून् मलान्वा देहस्य विशोष्योल्लेखयेच्च यत् ।
लेखनं तद्यथा क्षौद्रं नीर मुष्णं वचा यवाः ॥