रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in contextद्वितीयोऽध्यायः । ۹१
खर्पर को अग्नि में खूब प्रत्तप्त कर बिजौरे निम्बू के रस में सात बार बुझाने-से शुद्ध हो जाता है। अथवा नरमूत्र, हयमूत्र तथा तक्र और काञ्जी में तप्त कर बुझाने से भी शुद्ध होजाता है ॥ १४७-१४८ ॥
अथ रसकस्य ताम्रादिरञ्जनविधिः—
नरमूत्रे स्थितो मासं रसको रञ्जयेद्ध्रुवम् ।
शुद्धताम्रं रसं तारं शुद्धस्वर्णप्रभं यथा ॥ १४९ ॥
खर्पर को एक मास तक मनुष्य के मूत्र में डुबो कर रखने से शुद्धताम्र, पारद तथा चांदी को सुवर्ण के समान कान्तियुक्त कर देता है ॥ १४९ ॥
अथ खर्परस्य भस्म तथा सत्त्वपातनविधिश्च—
हरिद्रात्रिफलारालसिन्धुधूमैः सटङ्कणैः ।
सारुष्करैश्च पादांशैः साम्लैः सम्मर्द्य खर्परम् ॥ १५० ॥
लिप्तं वृन्ताकमूषायां शोषयित्वा निरुध्य च ।
मूषां मूषोपरि न्यस्य खर्परं प्रधमेत्ततः ॥ १५१ ॥
खर्परे प्रद्रुते ज्वाला भवेन्नीला सिता यदि ।
तदा सन्दंशतो मूषां धृत्वा कृत्वा त्वधोमुखीम् ॥ १५२ ॥
शनैरास्फालयेद्भूतौ यथा नालं न भज्यते ।
वङ्गाभं पतितं सत्त्वं समादाय नियोजयेत् ।
एवं त्रिचतुरैर्वारैः सर्वं सत्त्वं विनिःसरेत् ॥ १५३ ॥
शुद्ध खर्पर के चूर्ण में हरिद्रा, त्रिफला, राल, गृहधूम सुहागा, भल्लातक (भिलांवा) प्रत्येक खर्पर से चतुर्थांश भाग की मात्रा से मिला कर काञ्जी या निम्बू के रस में घोट कर वृन्ताक नाम की मूषा में लेप कर दें। सूखने पर मूषा का मुख बन्द करके इसे दूसरी मूषा के ऊपर रखकर अग्नि में फूंके। इस तरह खर्पर के द्रुत होने पर मूषा से श्वेत या नीली ज्वाला निकलने लगे तब उसे संड़सी से पकड़ कर पृथ्वी की ओर मुख औंधा कर ताड़न करे। परन्तु मूषा की नाल को बचाना चाहिए। इस तरह वङ्ग के समान सत्त्व निकलता है। इस विधि को तीन या चार वार करने से सम्पूर्ण सत्त्व निकल जाता है। इसका सर्वत्र प्रयोग करें ॥ १५०-१५३ ॥