रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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रसरत्नसमुच्चये—
औषधिकर्म में प्रथम का प्रयोग प्रशस्त है। यह प्रायः अमेरिका की खानों से आता है। आज काल बाजार में खर्पर नाम से जो खनिज आता है वह एक प्रकार की मृत्तिका है जहां तक हो सके उसका प्रयोग न करें शुद्ध खनिज मंगवा कर ही प्रयोग करना चाहिए।
सस्यकस्य प्रयोगविषयो गुणाश्च—
सत्त्वपाते शुभः पूर्वो द्वितीयश्चौषधादिषु ।
रसकः सर्वमेहघ्नः कफपित्तविनाशनः ॥
नेत्ररोगक्षयघ्नश्च लोहपारदरञ्जनः ॥ १४३ ॥
नागार्जुनेन सन्दिष्टौ रसश्च रसकावुभौ ।
श्रेष्ठौ सिद्धरसौ ख्यातौ देहलोहकरौ परम् ॥ १४४ ॥
रसश्च रसकश्चोभौ येनाग्निसहनौ कृतौ ।
देहलोहमयी सिद्धिर्दासी तस्य न संशयः ॥ १४५ ॥
दर्दुरु नामक खर्पर का सत्त्वपातन कर्म में प्रयोग होता है तथा औषधियों में कारवेल्लक का प्रयोग होता है । खर्पर बीस प्रकार के प्रमेह, कफ, पित्त, नेत्ररोग और राजयक्ष्मा को नष्ट करता है । लोह तथा पारद को रङ्ग देता है । नागार्जुनाचार्य ने खर्पर तथा पारद को सिद्ध रस कहा है तथा ये दोनों देह को स्थिर करते हैं । जो मनुष्य खर्पर तथा पारद को अग्नि में नहीं उड़ने वाले धर्म का बना देता है अथवा जो मनुष्य दोनों को अपनी पाचकाग्नि से पचा लेता है उसकी देहसिद्धि दासी बन जाती है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है ॥ १४३–१४५ ॥
अथ शोधनम्—
कटुकालाबुनिर्यास आलोद्य रसकं पचेत् ।
शुद्धं दोषविनिर्मुक्तं पीतवर्णं च जायते ॥ १४६ ॥
खर्पर को कड़वी तुम्बी के रस में घोट कर पकाने से दोषरहित और शुद्ध होजाता है तथा इसका रङ्ग पीला होजाता है ॥ १४६ ॥
अथ मतान्तरम्—
खर्परः परिसन्तप्तः सप्तवारं निमज्जितः ।
बीजपूररसस्यान्तर्निर्मलत्वं समश्नुते ॥ १४७ ॥
नृमूत्रे वाऽश्वमूत्रे वा तक्रे वा काञ्जिकेऽथवा ।
प्रताप्य मज्जितं सम्यक् खर्परं परिशुद्ध्यति ॥ १४८ ॥