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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

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DevanagariHindipublished362 pages

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द्वितीयोऽध्यायः।
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(मिनरल ओइल Mineral oil) का यौगिक है। इसलिये इसको अग्नि पर तपाने का निषेध है। क्योंकि उसमें पेट्रोल जाति का तैल होने से शीघ्र ही उड़न शील है तथा अग्निपरीक्षा करने पर निर्धूम होने को लिखा है और जल के अन्दर डूबने का भी निषेध है (अर्थात् यह खनिज तैल है इससे जलपर तैरेगा)

यथा—"वह्नौ क्षिप्तं भवेद्यत्तल्लिङ्गाकारमधूमकम् ।
सलिलेऽप्यविलीनञ्च तच्छुद्धं हिशिलाजतु ॥

यह द्रव्य शिलाजत्वादिक लौह आदि अनेकों योगों में पड़ता है तथा उन से क्षयरोग में बहुत लाभ होता है। आधुनिक चिकित्सक भी पेट्रोलियम इमल्शन (Patrolium Imultion) का क्षय में बहुत प्रयोग करते हैं। इस को वेन्जर्स इमल्शन कहते हैं। यह आधुनिक चिकित्सकों ने प्राचीन चिकित्सकों के रसग्रन्थों से ही सीखकर प्रयोग करना प्रारम्भ किया है। तथा इसग्रन्थ में जो इनके उत्पत्ति का (ग्रीष्मे तीव्रार्कतप्तेभ्यः,) इत्यादि श्लोकों से वर्णन किया गया है वह अत्यन्त युक्तियुक्त है।

स्वर्णगर्भ गिरेर्जातो जपापुष्पनिभो गुरुः ।
स स्वल्पतिक्तः सुस्वादुः परमं तद्रसायनम् ॥ १०४ ॥
रूप्यगर्भ गिरेर्जातं मधुरं पाण्डुरं गुरु ।
शिलाजं पित्तरोगघ्नं विशेषात्पाण्डुरोगहृत् ॥ १०५ ॥
ताम्रगर्भ गिरेर्जातं नीलवर्णं घनं गुरु ।
शिलाजं कफवातघ्नं तिक्तोष्णं क्षयरोगहृत् ॥ १०६ ॥

जिस हिमालय पर्वत की खान या चट्टान में सुवर्ण भाग ज्यादा होता है उससे निकली शिलाजीत जपापुष्प के समान लालवर्ण, वजन में भारी और कुछ स्वाद में तिक्त तथा स्वादु होता है। यह उत्तम रसायन है। चांदी की खान वाले स्थान से निकली शिलाजीत भारी, मधुर और पाण्डुरवर्ण की होती है। इससे पित्तरोग और विशेषकर पाण्डुरोग नष्ट होता है। ताम्रधातु युक्त पर्वत की खान से निकली शिलाजीत नीलवर्ण, भारी और ठोस होती है यह शिलाजीत तिक्त तथा उष्ण है कफ और वात विकार से उत्पन्न रोग तथा क्षयरोग को नष्ट करती है ॥ १०४-१०६ ॥

शुद्धशिलाजतुलक्षणम्—
वह्नौ क्षिप्तं भवेद्यत्तल्लिङ्गाकारमधूमकम् ।
सलिलेऽप्यविलीनं च तच्छुद्धं हि शिलाजतु ॥ १०७ ॥

रस० ६