Skip to content
SarvaKosh
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished362 pages

Page 170 of 362

Read in context
Page 170

८० रसरत्नसमुच्चये-

विमल का सत्व और शुद्ध पारद समान मात्रा में घोटकर अग्नि में द्रुत हुए गन्धक के साथ मिलाकर तीन गुणी हरताल के साथ जारण करें। फिर विमल सत्व से पांच गुणी मनःशिला मिला कर वालुका यंत्र में पाक करना चाहिए। स्वाङ्ग शीत होने पर उस यन्त्र से निकाल कर सत्व से दशमांश चांदीभस्म और उतनी ही वैक्रान्त भस्म मिलाकर घोट कर वस्त्र से छान कर शीशी में रख लेना चाहिये। फिर इस विमल रसायन को बलानुसार एक या दो रत्ती के प्रमाण से त्रिकटु और त्रिफला तथा घृत के साथ सेवन करने से तीव्रज्वर, शोथ, पाण्डुरोग, प्रमेह, अर्श, अरुचि, संग्रहणी, शूल, राजयक्ष्मा, कामला, शिरदर्द तथा समग्र वात तथा पित्त जन्य रोगों को नष्ट करता है। ज्यादा क्या कहें जैसे २ रोग हो उनके अनुकूल अनुपान के साथ देने से लाभ करता है ॥ ९८-१०१ ॥

अथ शिलाजतु-

शिलाजतुभेदाः-

शिलाधातुर्द्विधा प्रोक्तो गोमूत्राद्यो रसायनः ।
कर्पूरपूर्वकश्चान्यस्तत्राद्यो द्विविधः पुनः ॥
ससत्त्वश्चैव निःसत्त्वस्तयोः पूर्वो गुणाधिकः ॥ १०२ ॥

शिलाजीत दो तरह की होती है। एक गोमूत्र के समान गन्धवाली और दूसरी कर्पूर के समान गन्धवाली। इन दोनों भेदों में गोमूत्र गंधी शिलाजीत उत्तम रसायन है। इस गोमूत्रगंधी शिलाजीत के भी दो भेद हैं। एक सत्व सहित, दूसरी सत्वहीन, इनमें भी प्रथम अधिक गुण प्रद होती हैं ॥ १०२ ॥

शिलाजतुन उत्पत्तिः-

ग्रीष्मे तीव्रार्कतप्तेभ्यः पादेभ्यो हिमभूभृतः ।
स्वर्णरूप्यार्कगर्भेभ्यः शिलाधातुर्विनिःसरेत् ॥ १०३ ॥

ग्रीष्म कालीन सूर्य के तीव्र ताप से तपे हुए और सुवर्ण, चांदी, तथा ताम्र धातुओं से युक्त हिमालय पर्वत के शिखरों की चट्टानों से शिलाजंतु निकलती है ॥ १०३ ॥

विमर्शः- आजकल शिलाजीत गिलगिट (कश्मीर का सीमा प्रान्त) ब्रिटिश गढवाल, बाघेश्वर, भूटान तथा तिब्बत के पहाड़ों से आती है। इसका यौगिक क्या है इसका अभी तक ठीक २ निर्णय नहीं हुआ है तथापि प्राचीनशास्त्र मत तथा अर्वाचीन रसायन शास्त्र के मतों का समन्वय करने से प्रतीत होता है कि यह खनिजतेल