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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

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DevanagariHindipublished362 pages

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प्रथमोऽध्यायः । २९

सामने रखकर खोज के साथ सारा वृत्त गागर में सागर की तरह भर दिया है। क्वचित् शब्द का प्रयोग अल्पमात्रा में मिलने के लिये और हीरकद्युति लस्टर एण्ड मॅन्टाइन तथा प्रमाणाद्धीरकात् यह वाक्य फ्रेक्चर कोन्कोइडल के लिये ऐसा जंचता है कि मानो पर्याय शब्द लिख दिये हैं। ऐसा वर्णन पढ़कर किस वैद्य को अभिमान न होगा कि हमारा शास्त्र वैसा ही वैज्ञानिक है जैसा आजकल के नवशिक्षित लोग वैज्ञानिक होने का दावा करते हैं। इस खनिज के कम मिलने से और इसकी उपयोगिता औषधि रूपमें अधिक देखकर सर्व प्रथम भारतीय रस शास्त्रियों ने रस कर्पूर के नाम से इसका रासायनिक विधि से निर्माण कर लिया। इसके बड़े कारखाने आज भी सूरत (गुजरात) में विद्यमान हैं। जहां पर प्रति वर्ष दो ढाई सौ मन माल तैयार होकर सारे देश में विक्रयार्थ जाता है। इसका भाव १२) से २४) प्रति सेर के लग भग रहता है। इसका भाव सदा पारद के भाव पर निर्भर रहता है। मद्रास, और हैदराबाद दक्षिण में भी इसके बनाने के कारखाने हैं। वहां प्रायः सभी लोग शीत के दिनों में इसका सेवन करते हैं। ये लोग सूरत का बना हुआ रस कर्पूर लेकर फिर से आतिशी शीशी में भर कर बालुकायन्त्र से अग्नि देकर उसे उड़ाकर पपड़ी की शक्ल में तैयार करते हैं और उसे शुद्ध समझते हैं। इन कारखानों में रस कर्पूर और हिङ्गुल बनाने वाले खास खास आदमी रहते हैं। उनका यह खानदानी रोजगार समझा जाता है। वे लोग बारी बारी से इसे बनाकर बेचते हैं। एक एक भठ्ठी में दो दो ढाई ढाई मन का घान उतारते हैं। ये घान पिण्डाकार बारीक चमकीले रवों के सम्मिलित कणों का समुदाय होता है। हाथ से दबाने पर इनका चूर्ण बारीक बारीक कणों में विभक्त हो जाता है।

रस कर्पूर की प्राचीन निर्माण विधि ।

शुद्धसूतसमं कुर्यात् प्रत्येकं गैरिकं सुधीः ।
इष्टिकां खटिकां तद्वत्स्फटिकां सिन्धुजन्म च ॥
वल्मीकं क्षारलवणं भाण्डरञ्जकमृत्तिकाम् ।
सर्वाण्येतानि सञ्चूर्ण्य वाससा चापि शोधयेत् ॥
एभिश्शूर्णैर्युतं सूतं यावद्यामं विमर्दयेत् ।
तच्चूर्णसहितं सूतं स्थालीमध्ये परिक्षिपेत् ॥
तस्याः स्थाल्या मुखे स्थालीमपरां धारयेत्समाम् ।
सङ्खकुट्टितमृदा मुद्रयेदनयोर्मुखम् ॥
संशोष्य मुद्रयेद् भूयो भूयः संशोष्य मुद्रयेत् ।
सम्यक् विशोष्य मुद्रां तां स्थालीं चुल्ल्यां विधारयेत् ॥
अग्निं निरन्तरं दद्याद्यावद्दिनचतुष्टयम् ।
अङ्गारोपरि तद्यन्त्रं रक्षेद्यत्नादहर्निशम् ॥