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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

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DevanagariHindipublished362 pages

Page 115 of 362

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Page 115

प्रथमोऽध्यायः । २४

शैलेऽस्मिञ्छिवयोः प्रीत्या परस्परजिगीषया ।
सम्पवृत्ते च सम्भोगे त्रिलोकक्षोभकारिणि ॥
विनिवारयितुं वह्निः सम्भोगं प्रेषितः सुरैः ।
कपोतरूपिणं प्राप्तं हिमवत्कन्दरेऽनलम् ॥
अपक्षिभावसंक्षुब्धं स्मरलीलाविलोकिनम् ।
तं दृष्ट्वा लज्जितः शम्भुर्विरतः सुरतात्तदा ॥
प्रच्युतश्चरमो धातुर्गृहीतः शूलपाणिना ।
प्रक्षिप्तो वदने वह्नेर्गङ्गायामपि सोऽपतत् ॥
वह्निः क्षिप्तस्तया सोऽपि परिदंदह्यमानया ।
सञ्जातास्तन्मलाद्धानाद्धातवः सिद्धिदायकाः ॥
यावदग्निमुखाद्रेतो न्यपतद्भूभुवि सर्वतः ।
शतयोजननिम्नास्ते जाताः कूपास्तु पञ्च च ।
तदाप्रभृति कूपस्थं तद्रेतः पञ्चधाऽभवत् ॥
( रसरत्नसमुच्चय पूर्वखण्ड प्र० अध्याय )

इन पारदोत्पत्ति विषयक श्लोकों की प्राचीनानुमत शब्दानुकूल व्याख्या ( स्पष्ट भावार्थ ) मैने प्रकरण में लिख दी है। किन्तु प्राचीनपारदोत्पत्ति की तुलना यदि आधुनिक विज्ञान के अनुसार करनी हो तो निम्न रूप से करनी चाहिए।

इस अवतरण का तात्त्विक भावार्थ यह विदित होता है कि हिमालय में जब जड़ और चैतन्य शक्ति के अन्दर संघर्षंण होता है तब पृथ्वी के अन्तराल में आग्नेय पदार्थ ज्वालामुखों के रूपमें प्रगट होने लगते हैं। उस समय त्रैलोक्य में क्षोभ उत्पन्न करने वाला भूकम्प पैदा होता है। संसार के हिम प्रदेशों में ही प्रायः ज्वालामुखी प्रगट होते हैं। अर्थात् "शैलेऽस्मिन्" आदि प्रथम श्लोक में इसी अभिप्राय का रूपक है। जहां भूकम्प के उपरान्त ज्वालामुखी का उद्गम होता है वहां पर पृथ्वी शतधा विदीर्ण हो जाती है जिसमें से प्रथम धूम्र वर्ण की गैस निकलती है। यह वृत्तान्त प्रायः (कपोतरूपिणं प्राप्तं हिमवत् कन्दरे स्थितम्) इस रूपकालङ्कार से दिखाया है। धुएं के निकलने के पश्चात् अग्नि की ज्वाला निकलने लगती है यह (अपक्षिभावसंक्षुब्धम् ) आदि दूसरे श्लोक का तात्पर्य हो सकता है। जब ज्वालामुखी का उद्गम हो जाता है तब भूकम्प होना बन्द हो जाता है इस प्रकार का अभिप्राय "तं दृष्ट्वा लज्जितः शम्भु विरतः सुरतात्तदा" इस पद्य के साथ मिल सकता है।

जब ज्वाला मुखो के आग्नेय पाषाण क्रमशः शीतल होने लगते हैं तब उसके अन्तराल के उड़नशील खनिज उष्ण जल के साथ मिल कर वाष्परूप में ऊपर आकर शीत होने पर जम जाते हैं। इसो बात के द्योतक अन्य दो श्लोक हैं। जो