झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ~ ३
रामचन्द्रराव ने राजा की स्थायी उपाधि पाते ही शासनसूत्र, पूरे
तौर पर, अपने हाथ में ले लिया और दो-एक दिन मे ही खजाने को
लगभग रीता कर दिया । सखूबाई को खजाने का खाली होना इतना नही
अखरा जितना अपने हाथ से राज्य की बागडोर का चला जाना ।
सखूबाई ज़रा ढली आयु की प्रचण्ड वेगमयी राजमाता थी । माथे
और चेहरे की शिकने राजदण्ड के निरन्तर कठोर उपयोग और क्रोध के
आवेशो के व्यवहार की कथा कहती थी । उसकी कठोरता विख्यात थी ।
सखूबाई से रामचन्द्रराव का राजा होना नही सहा गया । उसने
रामचन्द्रराव को मरवा डालने का षडयन्त्र रचा ।
झाँसी के लक्ष्मी-फाटक के बाहर लक्ष्मी-तालाब के दक्षिण-पश्चिमी
सिरे पर महालक्ष्मी का मन्दिर है । इस मन्दिर के चौपडे में सखूबाई ने
अपने लडके का वध करने के लिये भाले गडवाये । रामचन्द्रराव को
तैरने का बहुत शौक था—विशेषकर रात में। सखूबाई को विश्वास था
कि उस रात रामचन्द्रराव चौपड़े में तैरने के लिये मुटार लगायगा—और
समाप्त हो जायगा ।
परन्तु लालू कोदेलकर नाम के एक मराठा युवक और मऊ के
उपरोक्त आनन्दराय की सहायता के कारण रामचन्द्रराव बच गया ।
आनन्दराय तो अपने घर मऊ निकल भागा, पर कोदेलकर को दो दिन
बाद सखूबाई ने मरवा डाला । लालू कोदेलकर के तीन दरिद्र नातेदार
थे । वे झाँसी से भागे । लालू के देहान्त के कुछ समय उपरान्त इन
तीनो के एक-एक लडकी हुई । इन बालिकाओ के नाम थे काशी,
सुन्दर और मुन्दर । तीनो बालिकाये सुन्दर थी । परन्तु इनका लालन-
पालन बडी दरिद्रता में हुआ । सखूबाई का क्रोध कोदेलकर ही तक
सीमित न था, उसके नातेदार भी आतङ्कग्रस्त थे और राज्याश्रय से
वञ्चित ।
रामचन्द्रराव अपनी माँ के साथ, इतना सब होने पर भी, कठोर
बर्ताव नही करना चाहता था । परन्तु उसके दोनो काका—रघुनाथराव