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रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

Autobiography of Ram Prasad Bismil

by पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी)

DevanagariHindipublished128 pages

Page 81 of 128

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Page 81

Uploaded By Rajesh Tanti.

बृहत् संगठन 69

भी चाहा, किंतु शाहजहाँपुर में ऐसे दब्बू वकील रहते हैं, जो सरकार के विरुद्ध
मुकदमे में सहायता देने में हिचकते हैं।
मुझसे खुफिया पुलिस के कप्तान साहब मिले। थोड़ी-सी बातें करके अपनी
इच्छा प्रकट की कि मुझे सरकारी गवाह बनाना चाहते हैं। थोड़े दिनों में एक मित्र
ने भयभीत होकर कि कहीं वह भी न पकड़ा जाए, बनारसीलाल से भेंट की और
समझा-बुझाकर उसे सरकारी गवाह बना दिया। बनारसीलाल बहुत घबराता था कि
कौन सहायता देगा, सजा जरूर हो जाएगी। यदि किसी वकील से मिल लिया
होता तो उसका धैर्य न टूटता। पं. हरकरननाथ शाहजहाँपुर आए, जिस समय वह
अभियुक्त श्री प्रेमकृष्ण खन्ना से मिले, उस समय अभियुक्त ने पं. हरकरननाथ से
बहुत कुछ कहा कि मुझसे तथा दूसरे अभियुक्तों से मिल लें। यदि वह कहा मान
जाते और मिल लेते तो बनारसीलाल को साहस हो जाता और वह डटा रहता।
उसी रात्रि को पहले एक इंसपेक्टर बनारसीलाल से मिले। फिर जब मैं सो गया
तब बनारसीलाल को निकालकर ले गए। प्रातःकाल पाँच बजे के करीब, जब
बनारसीलाल की कोठरी में से कुछ शब्द सुनाई दिया, तो मैंने बनारसीलाल को
पुकारा। पहरे पर जो कैदी था, उससे मालूम हुआ, बनारसीलाल बयान दे चुके।
बनारसीलाल के संबंध में सब मित्रों ने कहा था कि इससे अवश्य धोखा होगा,
पर मेरी बुद्धि में कुछ न समाया था। प्रत्येक जानकार ने बनारसीलाल के संबंध
में यही भविष्यवाणी की थी कि वह आपत्ति पड़ने पर अटल न रह सकेगा। इस
कारण सबने उसे किसी प्रकार के गुप्त कार्य में लेने की मनाही की थी। अब तो
जो होना था सो हो ही गया।
थोड़े दिनों बाद जिला कलक्टर मिले। कहने लगे फाँसी हो जाएगी। बचना
हो तो बयान दे दो। मैंने कुछ उत्तर न दिया। तत्पश्चात् खुफिया पुलिस के
कप्तान साहब मिले, बहुत-सी बातें कीं। कई कागज दिखलाए। मैंने कुछ-कुछ
अंदाजा लगाया कि कितनी दूर तक ये लोग पहुँच गए हैं। मैंने कुछ बातें बनाईं,
ताकि पुलिस का ध्यान दूसरी ओर चला जाए, परंतु उन्हें तो विश्वसनीय सूत्र हाथ