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रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

Autobiography of Ram Prasad Bismil

by पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी)

DevanagariHindipublished128 pages

Page 80 of 128

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Page 80

Uploaded By Rajesh Tanti.

68 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा

जेल

जेल में पहुँचते ही खुफिया पुलिस वालों ने यह प्रबंध कराया कि हम सब
एक-दूसरे से अलग रखे जाएँ, किंतु फिर भी एक-दूसरे से बातचीत हो जाती थी।
यदि साधारण कैदियों के साथ रखते तब तो बातचीत का पूर्ण प्रबंध हो जाता,
इस कारण से सबको अलग-अलग तनहाई की कोठरियों में बंद किया गया। यही
प्रबंध दूसरे ज़िले की जेलों में भी, जहाँ-जहाँ भी इस संबंध में गिरफ्तारियाँ हुई
थीं, किया गया था। अलग-अलग रखने से पुलिस को यह सुविधा होती है कि
प्रत्येक से पृथक्-पृथक मिलकर बातचीत करते हैं। कुछ भय दिखाते हैं, कुछ
इधर-उधर की बातें करके भेद जानने का प्रयत्न करते हैं। अनुभवी लोग तो
पुलिस वालों से मिलने से इंकार ही कर देते हैं। क्योंकि उनसे मिलकर हानि के
अतिरिक्त लाभ कुछ भी नहीं होता। कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जो समाचार जानने
के लिए कुछ बातचीत करते हैं। पुलिस वालों से मिलना ही क्या है। वे तो
चालबाजी से बात निकालने की ही रोटी खाते हैं। उनका जीवन इसी प्रकार की
बातों में व्यतीत होता है। नवयुवक दुनियादारी क्या जानें ? न वे इस प्रकार की
बातें ही बना सकते हैं।
जब किसी तरह कुछ समाचार ही न मिलते तब तो जी बहुत घबराता। यही
पता नहीं चलता कि पुलिस क्या कर रही है, भाग्य का क्या निर्णय होगा ?
जितना समय व्यतीत होता जाता था उतनी ही चिंता बढ़ती जाती थी।
जेल-अधिकारियों से मिलकर पुलिस यह भी प्रबंध करा देती है कि मुलाकात करने
वालों से घर के संबंध में बातचीत करें, मुकदमे के संबंध में कोई बातचीत न
करें। सुविधा के लिए सबसे प्रथम यह परमावश्यक है कि एक विश्वास-पात्र
वकील किया जाए जो ठीक समय पर आकर बातचीत कर सके। वकील के लिए
किसी प्रकार की रुकावट नहीं हो सकती। वकील के साथ अभियुक्त की जो बातें
होती हैं, उनको कोई दूसरा सुन नहीं सकता। क्योंकि इस प्रकार का कानून है,
यह अनुभव बाद में हुआ। गिरफ्तारी के बाद शाहजहाँपुर के वकीलों से मिलना