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रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

Autobiography of Ram Prasad Bismil

by पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी)

DevanagariHindipublished128 pages

Page 74 of 128

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Page 74

Uploaded By Rajesh Tanti.

62 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा

बिना रुपये के कुछ होता दिखाई न पड़ता था। रुपये का प्रबंध करना नितांत
आवश्यक था। किंतु वह हो कैसे ? दान कोई देता न था, कर्ज भी न मिलता
था और कोई उपाय न देख डाका डालना तय हुआ। किंतु किसी व्यक्ति विशेष
की सम्पत्ति पर डाका डालना हमें ठीक न लगता था। सोचा, यदि लूटना है तो
सरकारी माल क्यों न लूटा जाए ? इसी उधेड़-बुन में एक दिन मैं रेल में जा रहा
था। गार्ड के डिब्बे के पास की गाड़ी में बैठा था। स्टेशन मास्टर एक थैली लाया
और गार्ड के डिब्बे में डाल गया। कुछ खटपट की आवाज़ हुई। मैंने उतर कर
देखा कि एक लोहे का संदूक रखा है। विचार किया कि इसी में थैली डाली
होगी। अगले स्टेशन पर उसमें थैली डालते भी देखा। अनुमान किया कि लोहे का
संदूक गार्ड के डिब्बे में जंजीर से बँधा रहता होगा, ताला पड़ा रहता होगा,
आवश्यकता होने पर ताला खोलकर उतार लेते होंगे। इसके थोड़े दिनों बाद
लखनऊ स्टेशन पर जाने का अवसर प्राप्त हुआ। देखा एक गाड़ी में से कुली
लोहे के आमदनी वाले संदूक उतार रहे हैं। निरीक्षण करने से मालूम हुआ कि
उसमें जंजीर ताला कुछ नहीं पड़ता, यों ही रखे जाते हैं। उसी समय निश्चय
किया कि इसी पर हाथ मारूँगा।
रेलवे डकैती (काकोरी)
उसी समय से धुन सवार हुई। तुरंत स्थान पर जा टाइम-टेबुल देखकर
अनुमान किया कि सहारनपुर से गाड़ी चलती है, लखनऊ तक अवश्य दस हजार
रुपये रोज की आमदनी होती होगी। सब बातें ठीक करके कार्यकर्त्ताओं का संग्रह
किया। दस नवयुवकों को लेकर विचार किया कि किसी छोटे स्टेशन पर जब
गाड़ी खड़ी हो, स्टेशन के तारघर पर अधिकार कर लें, और गाड़ी का संदूक
उतारकर तोड़ डालें, जो कुछ मिले उसे लेकर चल दें, परंतु इस कार्य में मनुष्यों
की अधिक संख्या की आवश्यकता थी। इस कारण यही निश्चय किया कि गाड़ी
की जंजीर खींचकर चलती गाड़ी को खड़ा करके तब लूटा जाए। संभव है कि