रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
by पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी)
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अपनी डेढ़ चावल की खिचड़ी अलग पकाया करते हैं। इसी कारण पृथक-पृथक
दलों का निर्माण होता है। इस प्रकार के मनुष्य प्रत्येक समाज तथा प्रत्येक जाति
में पाए जाते हैं। इनसे क्रांतिकारी दल भी मुक्त नहीं रह सकता। नवयुवकों का
स्वभाव चंचल होता है, वे शांत रहकर संगठित कार्य करना बड़ा कठिन समझते
हैं। उनके हृदय में उत्साह की उमंगें उठती हैं। वे समझते हैं दो-चार अस्त्र-शस्त्र
हाथ आए कि हमने सरकार को नाकों चने चबवा दिए। मैं भी जब क्रांतिकारी
दल में योग देने का विचार कर रहा था, उस समय मेरी प्रबल इच्छा थी कि यदि
एक रिवाल्वर मिल जाए तो दस-बीस अंग्रेजों को मार दूँ। इसी प्रकार के भाव
मैंने कई नवयुवकों में देखे। उनकी बड़ी प्रबल हार्दिक इच्छा होती है कि किसी
प्रकार एक रिवाल्वर यां पिस्तौल उनके हाथ लग जाए तो वे उसे अपने पास
रख लें।
मैंने उनसे रिवाल्वर पास रखने का लाभ पूछा, तो कोई संतोषजनक उत्तर
नहीं दे सके। कई युवकों को मैंने इस शौक को पूरा करने में सैकड़ों रुपये
बरबाद करते भी देखा है। किसी क्रांतिकारी आंदोलन के सदस्य नहीं, कोई विशेष
कार्य भी नहीं, महज शौकिया रिवाल्वर पास रखेंगे। ऐसे ही थोड़े से युवकों का
एक दल एक महोदय ने भी एकत्रित किया। ये सब बड़े सच्चरित्र, स्वाभिमानी
और सच्चे कार्यकर्त्ता थे। इस दल ने विदेश से अस्त्र प्राप्त करने का बड़ा उत्तम
सूत्र प्राप्त किया था, जिससे इच्छानुसार पर्याप्त अस्त्र मिल सकते थे। उन अस्त्रों
के दाम भी अधिक न थे। अस्त्र भी पर्याप्त संख्या में बिल्कुल नए मिलते थे।
यहाँ तक प्रबंध हो गया था कि यदि हम लोग रुपये का उचित प्रबंध कर देंगे,
और समय से मूल्य निपटा दिया करेंगे, तो हमको माल उधार भी मिल जाया
करेगा और हमें जब जिस प्रकार के जितनी संख्या में अस्त्रों की आवश्यकता
होगी, मिल जाया करेंगे। यही नहीं समय आने पर हम विशेष प्रकार की मशीन
वाली बंदूकें भी बनवा सकेंगे। इस समय समिति की आर्थिक अवस्था बड़ी खराब
थी। इस सूत्र के हाथ लग जाने और इसके लाभ उठाने की इच्छा होने पर भी