रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमप्रकाशः १. ( १३ )
मू०-छप्पै ॥ गाधिराजको पुत्र साधिसब मित्रशत्रुबल ।
दान कृपान विधान वश्य कीन्हों भुवमण्डल ॥ कैमन अपने
हाथ जीति जग इन्द्रियगन अति । तपबल याही देह भये
क्षत्रिय ते ऋषि पति ॥ तेहि पुर प्रसिद्ध केशव सुमति
काल अतीतागतनिगुनि । तहँ अद्भुत गति पगु धारियो
विश्वामित्र पुनि ॥ २४ ॥ प्रज्झटिकाछन्द ॥ पुनि आये
सरयू सरित तीर तहँ देखे उज्ज्वल अमलनीर । नव नि-
रखि निरखि द्युति गति गंभीर । कछु बरनन लागे सुमति
धीर ॥ २५ ॥ अति निपट कुटिल गति यदपि आय ।
वह देत शुद्ध गति छुवत पाय ॥ कछु आपुन अध अध
गति चलन्ति । झलपति तन को ऊरध फलन्ति ॥ २६ ॥
मदमत्त यदपि मातंग संग । अति तदपि पतित पावन
तरंग बहु न्हाइ न्हाइ जेहि जल सनेह ॥ सब जात स्वर्ग
शूकर सुदेह ॥ २७ ॥
टी०-त्रिकाल दरशीत्व ते जेतो कालबीते रामचन्द्रको अवतार होनो रहै
सो कालअतीतकहे बीतो गुनिकै औ जा कालमें रामचन्द्रजू यज्ञरक्षा करनलायक
भये सो काल आगत आयो गुनिकै ॥ २४ ॥ २५ ॥ दुवौछंदन में विरोधा-
भास है आप कहे अपना औ आप कहे जल के छुवतही शुद्धगति मुक्ति देत है
अथवा जाके जलको कहूँ अनतहूँ छुवौ तौ शुद्धगति देतहै ऊरधपदते स्वर्ग
जानौं ॥ २६ ॥ मद मदिरा सों मत्त यद्यपि मातंग चाण्डालनको संग है
विरुद्धार्थः॥“मातंगःश्वपचीहस्तीत्यभिधानचिंतामणिः”॥औ मत्तगज जामें स्नान
करते हैं इत्यविरोधः पतितपावन कहे पतितन को पवित्र कर्ता स्नेह सों ताके
जलमें न्हाइन्हाइकै शूकरपर्यंत बहु प्राणी सुंदर देह को धरि सब स्वर्ग जातेहैं
अथवा सनेह कहे अप्सरादिकनके इति शेषः ॥ स्नेहसहित अर्थ अप्सरादि स्नेह
सहित ताको स्वर्ग लैजाती है अथवा तेहिके जलके स्नेहहूँ सों कहूं होइ सरयू
जलमें स्नेह करै स्वर्ग जाइ कहूं सदेहपात है देह सहित स्वर्ग जाइ अर्थ याही