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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 18, कुल 269 में से

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पृष्ठ 18

( १२ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
चंद्र को इष्टदेवता करचो तब सीता सम सदा रामनिकट वर्तिनी हमारी मति के
लोचन कमलमें भ्रमर सदृश रामचन्द्र चरण में अनेक कौतुक करने लगे ॥१९॥
मानस मानसर औ मन आय आपने लोचननके अनुरूप कहे योग्य और के
लोचनके योग्य कज्जलादि अंजन है संतन के लोचननके योग्य रामरूपही हैं ऐसे जे
जिन रामचंद्र के अनेक प्रतिबिंब श्यामरूप रूपी अंजन हैं तिनकरि जे
संत अंजित हैं अर्थ रामचंद्र के प्रतिबिंब रूपनको जे संत जन ध्यानमें आनत
हैं अथवा श्याम स्वरूपनि कहे श्यामरूपता रूपी जो अंजन है ता करिकै, जे
संत अंजित हैं तिन संतनको त्रिकालदर्शी और निर्गुण पशीं नेत्रन करि ज्योति
स्पर्श करै या अर्थ ब्रह्मज्योति के दृष्टा होत बेर नहीं लागति जे रामचंद्रको
ध्यान करत हैं ते त्रिकालदर्शी होत हैं औ ब्रह्मज्योति को देखत हैं इति भावार्थः॥
अथवा निर्गुणपर्शी होत कहे निर्गुणज्योति में मिलिजात बेर नहीं लागति
अथवा निर्गुणते पर अन्य विष्णुकी श्रीशोभा होत बेर नहीं लागति पुरातन
पूर्व कृत ॥ २० ॥
मू०-दो०-जागति जाकी ज्योति जग; एकरूपस्वच्छंद ॥
रामचंद्रकी चन्द्रिका, वरणतहों बहुछंद ॥२१॥ रोलाछंद ॥
शुभ सूरजकुल कलशनृपति दशरथ भये भूपति ॥ तिनके
सुतभये चारि चतुर चितचारु चारुमति ॥ रामचन्द्र
भुवचन्द्र भरत भारत भुवभूषण । लक्ष्मण अरु शत्रुघ्न
दीहदानव दलदूषण ॥ २२ ॥ धत्ताछन्द ॥ सरयूसरिता तट
नगर बसै अवध नाम यश धामघर ॥ अघओघ विनाशी
सब पुरवासी अमरलोक मानहुँ नगर ॥ २३ ॥
टी०-ज्योति ब्रह्मज्योति अथवा अंगछवि औ बहु छंद कहे अनेक रंगतौ
जा रामरूपी चन्द्रकी ज्योति तौ एक रूप है ताकी चन्द्रिका अनेक रंगहै वो
आश्चर्य है यह युक्ति है औ अर्थ यह कि बहुत छंद जे दोहाहि हैं तिनसों
युक्त ॥ २१ ॥ सूर्य कुलके कलश जे नृपति अजादि हैं तिनमें दशरथ
भूपति राजा भये भारत भरतखंड ॥ २२ ॥ यश को धाम कहे घर है धरा पृथ्वी
जाकी अयोध्यापुरी के वासी देवतन सरिस अघपापन के ओघ समूहन के विनाशी
हैं तासों देवलोक सम है ॥ २३ ॥