रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमप्रकाशः १. ( ७ )
ऐसी मति वाणीको दीन्हीं औजवाणी के पति पुत्रादि चतुरादि मुखसों वर्णत हैं
और अर्थ एकही है अथवा सरस्वती की उक्ति है कि वाणी जो मैंहों तासों
जगरानी सीताजूकी उदारता बखानी जाइ कहे जाति हैं कोहसों अर्थ यह कि
मोसों नहीं बखानी जाती काहे ते कि ऐसी कौनकी उदारमति भई है कि जो
बखाने काहेते कि देवतादि औ मेरे पति पुत्रादि सब बखानत हैं ताहू पर नई नई
रहति है ऐसी सरस्वती को अथवा सीताजूको नमस्कार करत हौं इति शेषः यामें
नमस्कारात्मक मंगल है ॥ २ ॥
मू०-अन्यच्च ॥ पूरण पुराण अरु पुरुष पुराण परिपूरण
बतावैं न बतावैं और उक्तिको ॥ दरशन देत जिन्हें दरशन
समुझै न नेति नेति कहै वेद छाँडि भेद युक्तिको ॥ योनि
यह केशोदास अनुदिन राम राम रटत रहत न डरत पुन-
रुक्तिको । रूप देहि अणिमाहि गुणदेहि गरिमाहि भक्तिदेहि
महिमाहि नाम देहि मुक्तिको ॥ ३ ॥
टी०-जिन रामचंद्र को पूर्णकहे संपूर्ण अठारहौं पुराण अथवा पूरण कहे जे
कछु वस्तु चाहत नहीं शुकादि पुराण स्कंदादि औ पुरुषपुराण लोमश मार्कं-
डेय आदि ते परिपूर्ण कहे सर्वत्र व्याप्त बतावत हैं और उक्ति कहै कथाको
नहीं बतावत अर्थ कि और तर्क नहीं करत श्रीरामचंद्रजी जाकोदर्शन देतहैं
ताको फेरि दर्शनकी समझ ज्ञान नहीं रहति अर्थ जाको रामचंद्र को दर्शन
होतहै सो तिनमें लीन ह्वै जात हैं सायुज्य मुक्तिको प्राप्त होतहै अथवा और
दर्शन स्त्री पुत्रादिकी समझ नहीं रहति अर्थ संसार को बंधन मोह छूटिजात है
रामरूपही ध्यानमें निरखत हैं औ वेद जिनको अनेक भेदसों गान करि नेति नेति
कहे ना इति ना इति कहे याही प्रकारको है सो न कहे नहीं हम जानत या प्रकार
सबभेदकी युक्तिको छोडि कहत है अर्थ यह कि जिनको प्रमाण वेदऊ नहीं
जानत रूप जो रामचंद्र को है सो अणिमा सिद्धिको देतहै औ गुण जेहैं ते
गरिमा सिद्धिको देतहैं औ मुक्तिमहिमा सिद्धिको देतिहै औ नाम मुक्तिको
देतहै यह जानिकै काव्यरीतिमें एकई वस्तु को द्वै बारकहौं तौ पुनरुक्ति दूषण
होतहै ताको भय छोडिकै मुक्ति की इच्छा करि अनुदिन रोज रोज राम