राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
Page 48 of 307
Read in contextसाधना के प्राथमिक सोपान ३५
आदि के निर्माण का सच्चा उद्देश्य यही था। अब भी बहुत से मन्दिरो और गिरजाघरो मे यह भाव देखने को मिलता है; परन्तु अधिकतर स्थलो मे लोग इनका उद्देश्य तक भूल गए हैं। चारो ओर पवित्र चिन्तन के परमाणु सदा स्पन्दित होते रहने के कारण वह स्थान पवित्र ज्योति से भरा रहता है। जो इस प्रकार के स्वतन्त्र कमरे की व्यवस्था नही कर सकते, वे जहाँ इच्छा हो वही बैठकर साधना कर सकते है। शरीर को सीधा रखकर बैठो। ससार मे पवित्र चिन्तन का एक स्रोत बहा दो। मन-ही-मन कहो—ससार मे सभी सुखी हो, सभी शान्ति लाभ करे, सभी आनन्द पावे। इस प्रकार पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, चहुँ ओर पवित्र चिन्तन की धारा बहा दो। ऐसा जितना करोगे, उतना ही तुम अपने को अच्छा अनुभव करने लगोगे। बाद मे देखोगे, 'दूसरे सब लोग स्वस्थ हो,' यह चिन्तन ही स्वास्थ्य-लाभ का सहज उपाय है। 'दूसरे लोग सुखी हो,' ऐसी भावना ही अपने को सुखी करने का सहज उपाय है। इसके बाद जो लोग ईश्वर पर विश्वास करते हैं, वे ईश्वर के निकट प्रार्थना करे—अर्थ, स्वास्थ्य अथवा स्वर्ग के लिए नही, वरन् हृदय मे ज्ञान और सत्य-तत्त्व के उन्मेष के लिए। इसके छोड बाकी सब प्रार्थनाएँ स्वार्थ से भरी हैं। इसके बाद भावना करनी होगी 'मेरा शरीर वज्रवत् दृढ़, सबल और स्वस्थ है। यह देह ही मेरी मुक्ति मे एकमात्र सहायक है। इसी की सहायता से मै यह जीवन-समुद्र पार कर लूँगा।' जो दुर्बल है वह कभी मुक्ति नही पा सकता। समस्त दुर्बलताओ का त्याग करो। देह से कहो, 'तुम खूब बलिष्ठ हो।' मन से कहो, 'तुम अनन्त शक्तिधर हो।' और स्वयं पर प्रबल विश्वास और भरोसा रखो।