राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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दिन बीतता है और रात आती है, इन दो समयो मे प्रकृति अपेक्षाकृत शान्त भाव धारण करती है। ब्राह्ममुहूर्त और गोधूलि ये दो समय मन की स्थिरता के लिए अनुकूल हैं। इन दो समय शरीर बहुत-कुछ शान्तभावापन्न रहता है। इस समय साधना करने से प्रकृति हमारी काफी सहायता करेगी, इसलिए इन्ही दो समयो में साधना करना आवश्यक है। यह नियम बना लो कि साधना समाप्त किए बिना भोजन न करोगे। ऐसा नियम बना लेने पर भूख का प्रबल वेग ही तुम्हारा आलस्य नष्ट कर देगा। भारत-वर्ष मे बालक यही शिक्षा पाते है कि स्नान-पूजा और साधना किए बिना भोजन नही करना चाहिए। कालान्तर मे यह उनके लिए स्वाभाविक हो जाता है, उनकी जब तक स्नान-पूजा और साधना समाप्त नही हो जाती, तब तक उन्हे भूख नही लगती।
तुममे से जिनको सुभीता हो, वे साधना के लिए यदि एक स्वतंत्र कमरा रख सके, तो अच्छा हो। इस कमरे को सोने के काम मे न लाओ। इसे पवित्र रखो। बिना स्नान किए और शरीर-मन को बिना शुद्ध किए इस कमरे मे प्रवेश न करो। इस कमरे मे सदा पुष्प और हृदय को आनन्द देनेवाले चित्र रखो। योगी के लिए ऐसे वातावरण मे रहना बहुत उत्तम है। सुबह और शाम वहाँ धूप और चन्दन-चूर्ण आदि जलाओ। उस कमरे में किसी प्रकार का क्रोध, कलह और अपवित्र चिन्तन न किया जाय। तुम्हारे साथ जिनके भाव मिलते है, केवल उन्ही को उस कमरे मे प्रवेश करने दो। ऐसा करने पर शीघ्र वह कमरा सत्त्वगुण से पूर्ण हो जायगा, यहाँ तक कि, जब किसी प्रकार का दुख या सशय आए अथवा मन चचल हो, तो उस समय उस कमरे मे प्रवेश करते ही तुम्हारा मन शान्त हो जायगा। मन्दिर, गिरजाघर