राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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Read in contextसाधना के प्राथमिक सोपान २५
सुनने से न होगा। फिर साधना मे बहुत से विघ्न भी हैं। पहला तो व्याधिग्रस्त देह है। शरीर स्वस्थ न रहे, तो साधना मे बाधा पडती है। अत शरीर को स्वस्थ रखना आवश्यक है। किस प्रकार का खान-पान करना होगा, किस प्रकार जीवन यापन करना होगा, इन सब बातो की ओर हमे विशेष ध्यान देना होगा। मन से सोचना होगा कि शरीर सबल हो—जैसा कि यहाँ के क्रिश्चियन साइन्स* मतावलम्बी करते है। बस, शरीर के लिये फिर और कुछ करने की जरूरत नही। यह हम कभी न भूले कि स्वास्थ्य उद्देश्य के साधन का एक उपाय मात्र है। यदि स्वास्थ्य ही उद्देश्य होता, तो हम तो पशुतुल्य हो गए होते। पशु प्राय अस्वस्थ नही होते।
दूसरा विघ्न है सन्देह। हम जो कुछ नही देख पाते, उसके सम्बन्ध मे सन्दिग्ध हो जाते हैं। मनुष्य कितनी भी चेष्टा क्यो न करे, वह केवल बात के भरोसे नही रह सकता। यही कारण है कि योगशास्त्रोक्त सत्यता के सम्बन्ध मे सन्देह उपस्थित हो जाता है। यह सन्देह बहुत अच्छे आदमियो में भी देखने को मिलता है। परन्तु साधना का श्रीगणेश कर देने पर बहुत थोडे दिनो में ही कुछ-कुछ अलौकिक व्यापार देखने को
*क्रिश्चियन साइन्स (Christian Science)—यह सम्प्रदाय मिसेज एड्डि नामक एक अमेरिकन महिला द्वारा प्रतिष्ठित हुआ है। इनके मतानुसार सचमुच जड नामक कोई पदार्थ नही, वह हमारे मन का केवल भ्रम है। विश्वास करना होगा—‘हमें कोई रोग नहीं,’ तो हम उसी समय रोगमुक्त हो जायँगे। इसका ‘क्रिश्चियन साइन्स’ नाम पडने का कारण यह है कि इसके मतावलम्बी कहते हैं, “हम ईसा का ठीक-ठीक पदानुसरण कर रहे हैं। ईसा ने जो अद्भुत क्रियाएँ की थी, हम भी वैसा करने में समर्थ है, और सब प्रकार से दोषशून्य जीवन यापन करना हमारा उद्देश्य है।”