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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

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राजयोग

किया है तब मेरे लिए भी इसका उल्लेख करना उचित जान पड़ता है। मैं श्वेताश्वतर उपनिषद् पर उनके भाष्य* से इस सम्बन्ध मे उनका मत उद्धृत करूँगा—"प्राणायाम के द्वारा जिस मन का मैल घुल गया है, वही मन ब्रह्म में स्थिर होता है। इसलिए शास्त्रो मे प्राणायाम के विषय का उल्लेख है। पहले नाडी-शुद्धि करनी पडती है तभी प्राणायाम करने की शक्ति आती है। अंगूठे से दाहिना नथुना दवाकर वाएँ नथुने से यथाशक्ति वायु अन्दर खींचो, फिर बीच मे तनिक देर भी विश्राम किए बिना वाईं नासिका वन्द करके दाहिनी नासिका से वायु निकालो। फिर दाहिनी नासिका से वायु ग्रहण करके बाईं नासिका से निकालो। दिन भर मे चार बार अर्थात् उषा, मध्याह्न, सायाह्न और निशीथ, इन चार समय पूर्वोक्त क्रिया का तीन बार या पाँच बार अभ्यास करने पर, एक पक्ष या महीने भर मे नाडी-शुद्धि हो जाती है। उसके बाद प्राणायाम पर अधिकार होगा।"

सदा अभ्यास आवश्यक है। तुम रोज देर तक बैठे हुए मेरी बात सुन सकते हो, परन्तु अभ्यास किए बिना तुम एक कदम भी आगे नही बढ़ सकते। सब कुछ साधना पर निर्भर है। प्रत्यक्ष अनुभूति बिना इन तत्त्वो का कुछ भी समझ मे नही आता। स्वय अनुभव करना होगा, केवल व्याख्या और मत


  • प्राणायामक्षपितमनोमलस्य चित्त ब्रह्मणि स्थित भवतीति प्राणायामो निर्दिश्यते। प्रथम नाडीशोधन कर्तव्यम्। तत प्राणायामे अधिकार। दक्षिण-नासिकापुटमंगुल्यावष्टभ्य वामेन वायु पूरयेत् यथाशक्ति। ततोऽनन्तर-मुत्सृज्यैव दक्षिणेन पुटेन समुत्सृजेत्। सव्यमपि धारयेत्। पुनर्दक्षिणेन पूरयित्वा सव्येन समुत्सृजेत् यथाशक्ति। त्रि पञ्चकृत्वो वा एव अभ्यस्यतः सवनचतुष्टयमपररात्रे मध्याह्ने पूर्वरात्रेऽर्धरात्रे च पक्षान्मासात् विशुद्धिर्भवति।

श्वेताश्वतर उपनिषद्, शांकरभाष्य—द्वितीय अध्याय, अष्टम श्लोक।