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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

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परिशिष्ट २८७

को प्राप्त कर लिया है, उसके संग के द्वारा भी विवेक प्राप्त होता है ।

न भोगात् रागशान्तिर्मुनिवत् ॥२७॥

अर्थ—जिस प्रकार भोग से सौभरि मुनि की आसक्ति दूर नही हुई थी, उसी प्रकार दूसरो की भी भोग के द्वारा आसक्ति नष्ट नही होती ।

पंचम अध्याय

योगसिद्धयोऽप्यौषधादिसिद्धिवन्नापलपनीयाः ॥१२८॥

अर्थ—ओषधि आदि के द्वारा आरोग्यसिद्धि होने के कारण जिस प्रकार मनुष्य ओषधि आदि की शक्ति को अस्वीकार नहीं करते, उसी प्रकार योगज सिद्धि को भी अस्वीकार नही किया जा सकता ।

षष्ठ अध्याय

स्थिरसुखमासनमिति न नियम. ॥२४॥

अर्थ—स्वस्तिक आदि आसन का अभ्यास करना ही पड़ेगा, ऐसा कोई नियम नही है । जिस प्रकार बैठना सुखकर हो और जिससे शरीर और मन विचलित न हो, वही आसन है ।

व्याससूत्र

चतुर्थ अध्याय—प्रथम पाद

आसीनः सम्भवात् ॥७॥

अर्थ—उपासना बैठकर ही सम्भव है, अतः बैठकर उपासना करनी चाहिए ।

ध्यानाच्च ॥८॥

अर्थ—ध्यान के कारण भी (बैठे हुए, अग-संचालन-क्रिया से रहित इत्यादि लक्षणयुक्त पुरुष को देखकर लोग कहते हैं,